भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता नाशरहित तो वह है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस 'अव्ययस्य'- अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं है। किन्तु इस 'अविनाशी', 'अमृत' का नाम क्या है? वह है कौन?- अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।१८।। अविनाशी, अप्रमेय, नित्यस्वरूप आत्मा के ये सभी शरीर नाशवान् कहे गये हैं, इसलिये भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर। आत्मा ही अमृत है। आत्मा ही अविनाशी है, जिसका तीनों काल में नाश नहीं होता। आत्मा ही सत् है। शरीर नाशवान् है यही असत् है, जिसका तीनों काल में अस्तित्व नहीं है। 'शरीर नाशवान् है, इसलिये तू युद्ध कर'- इस आदेश से यह स्पष्ट नहीं होता कि अर्जुन केवल कौरवों को मारे। पाण्डव-पक्ष में भी तो शरीर ही खड़े थे, क्या पाण्डवों के शरीर अविनाशी थे? यदि शरीर नाशवान् है तो श्रीकृष्ण किसकी रक्षा में खड़े थे? क्या अर्जुन कोई शरीरधारी था? शरीर जो असत् है, जिसका अस्तित्व नहीं है, जिसे रोका नहीं जा सकता, क्या श्रीकृष्ण उस शरीर की रक्षा में खड़े हैं? यदि ऐसा है तो वे भी अविवेकी और मूढ़ हैं; क्योंकि आगे श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि जो केवल शरीर के लिये ही पचता है, श्रम करता है वह अविवेकी और मूढ़बुद्धि है। वह पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है। (३/ १३) अन्ततः अर्जुन कौन था? वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है। अनुरागी के लिये इष्ट सदैव रथी बनकर साथ में रहते हैं। सखा की भाँति उसका मार्गदर्शन करते हैं। आप शरीर नहीं हैं। शरीर तो आवरण है, रहने का मकान है। उसमें रहनेवाला अनुरागपूरित आत्मा है। भौतिक युद्ध, मारने-काटने से शरीरों का अन्त नहीं होता। यह शरीर छूटेगा तो आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेगा। इसी सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि जिस प्रकार बाल्यकाल से युवा या वृद्धावस्था आती है, उसी प्रकार देहान्तर की प्राप्ति होती है। शरीर काटेंगे तो जीवात्मा नया वस्त्र बदल लेगा। शरीर संस्कारों के आश्रित है और संस्कार मन पर आधारित हैं। 'मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।' (पंचदशी, ५/६०) मन का