यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ५५ भी कहा जाता है। इसलिये धनंजय ! तू समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल की वासनावाले अत्यन्त कृपण हैं। बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५०॥ समत्व बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य-पाप दोनों को ही इसी लोक में त्याग देता है, उनसे लिपायमान नहीं होता। इसलिये समत्व बुद्धियोग के लिये चेष्टा कर। ‘योगः कर्मसु कौशलम्’- समत्व बुद्धि के साथ कर्मों का आचरण-कौशल ही योग है। संसार में कर्म करने के दो दृष्टिकोण प्रचलित हैं। लोग कर्म करते हैं तो उसका फल भी अवश्य चाहते हैं या फल न मिले तो कर्म करना ही नहीं चाहते; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण इन कर्मों को बन्धनकारी बताते हुए ‘आराधना’ को एकमात्र कर्म मानते हैं। इस अध्याय में उन्होंने कर्म का नाम मात्र लिया। अध्याय ३ के ९वें श्लोक में उसकी परिभाषा दी और चौथे अध्याय में कर्म के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण ने सांसारिक परम्परा से हटकर कर्म करने की कला बतायी कि कर्म तो करो, श्रद्धापूर्वक करो; किन्तु फल के अधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दो। फल जायेगा कहाँ? यही कर्मों के करने का कौशल है। निष्काम साधक की समग्र शक्ति इस प्रकार कर्म में लगी रहती है। आराधना के लिये ही तो शरीर है। फिर भी जिज्ञासा स्वाभाविक है कि क्या सदैव कर्म ही करते रहना है या इसका कुछ परिणाम भी निकलेगा? इसे देखें- कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१॥ बुद्धियोग से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल को त्यागकर जन्म और मृत्यु के बन्धन से छूट जाते हैं। वे निर्दोष अमृतमय परमपद को प्राप्त होते हैं। यहाँ तीन बुद्धियों का चित्रण है। (श्लोक ३९) सांख्य बुद्धि में दो फल हैं- स्वर्ग और श्रेय। (श्लोक ५१) कर्मयोग में प्रवृत्त बुद्धि का एक ही फल है