भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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द्वितीय अध्याय ५९ महापुरुष कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को विषयों में नहीं फैलाता। एक बार जब इन्द्रियाँ सिमट गयीं तो संस्कार ही मिट जाते हैं, पुनः वे नहीं निकलते। निष्काम कर्मयोग के आचरण द्वारा परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ उस पुरुष का विषयों से राग भी निवृत्त हो जाता है। प्रायः चिन्तन-पथ में हठ करते हैं। हठ से इन्द्रियों को रोककर वे विषय से तो निवृत्त हो जाते हैं किन्तु मन में उनका चिन्तन, राग लगा रहता है। यह आसक्ति ‘परं दृष्ट्वा’- परमात्मा का साक्षात्कार करने के बाद ही निवृत्त होती है, इसके पूर्व नहीं। ‘पूज्य महाराज जी’ इस सम्बन्ध में अपनी एक घटना बताया करते थे। गृहत्याग से पूर्व उन्हें तीन बार आकाशवाणी हुई थी। हमने पूछा- “महाराज जी ! आपको आकाशवाणी क्यों हुई, हम लोगों को तो नहीं हुई?” तब इस पर महाराज जी ने कहा- ‘हो ! ई शंका मोहूं के भई रही।’ अर्थात् यह सन्देह मुझे भी हुआ था। तब अनुभव में आया कि मैं सात जन्म से लगातार साधु हूँ। चार जन्म तो केवल साधुओं-सा वेश बनाये, तिलक लगाये, कहीं विभूति पोते, कहीं कमण्डल लिये विचरण कर रहा हूँ। योगक्रिया की जानकारी नहीं थी। लेकिन पिछले तीन जन्म से बढ़िया साधु हूँ, जैसा होना चाहिये। मुझमें योगक्रिया जागृत थी। पिछले जन्म में पार लग चला था, निवृत्ति हो चली थी; किन्तु दो इच्छाएँ रह गयी थीं- एक स्त्री और दूसरी गाँजा। अन्तर्मन में इच्छाएँ थीं, किन्तु बाहर से हमने शरीर को दृढ़ रखा। मन में वासना लगी थी इसलिये जन्म लेना पड़ा। जन्म लेते ही भगवान ने थोड़े ही समय में सब दिखा-सुनाकर निवृत्ति दिला दी, दो-तीन चटकना दिया और साधु बना दिया। ठीक यही बात श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों द्वारा विषयों को न ग्रहण करनेवाले पुरुष के भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं; किन्तु साधना द्वारा परमपुरुष परमात्मा का साक्षात्कार कर लेने पर वह विषयों के राग से भी निवृत्त हो जाता है। अतः जब तक साक्षात्कार न हो, कर्म करना है। उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।। ( रामचरितमानस, ५/४८/६ ) इन्द्रियों को विषयों से समेटना कठिन है। इस पर प्रकाश डालते हैं-