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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

प्रथम अध्याय १३ वास्तविक सत्संग है। यह सत्संग चिन्तन, ध्यान और समाधि के अभ्यास से सम्पन्न होता है। ज्यों-ज्यों सत्य के सान्निध्य में सुरत टिकती जायेगी, त्यों-त्यों एक-एक श्वास पर नियंत्रण मिलता जायेगा, मनसहित इन्द्रियों का निरोध होता जायेगा। जिस दिन सर्वथा निरोध होगा, वस्तु प्राप्त हो जायेगी। वाद्ययन्त्रों की तरह चित्त का आत्मा के स्वर-में-स्वर मिलाकर संगत करना ही सत्संग है। बाह्यमणि कठोर है, किन्तु श्वासमणि पुष्प से भी कोमल है। पुष्प तो विकसित होने या टूटने पर कुम्हलाता है; किन्तु आप अगले श्वास तक जीवित रहने की गारण्टी नहीं दे सकते। किन्तु सत्संग सफल होने पर प्रत्येक श्वास पर नियंत्रण दिलाकर परम लक्ष्य की प्राप्ति करा देता है। इसके आगे पाण्डवों की कोई घोषणा नहीं है; किन्तु प्रत्येक साधन कुछ-न-कुछ निर्मलता के पथ में दूरी तय कराता है। आगे कहते हैं- काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।१७।। कायारूपी काशी। पुरुष जब सब ओर से मनसहित इन्द्रियों को समेटकर काया में ही केन्द्रित करता है, तो ‘परमेष्वासः’- परम ईश में वास का अधिकारी हो जाता है। परम ईश में वास दिलाने में सक्षम काया ही काशी है। काया में ही परम ईश का निवास है। ‘परमेष्वास’ का अर्थ श्रेष्ठ धनुषवाला नहीं बल्कि परम+ईश+वास है। शिखा-सूत्र का त्याग ही ‘शिखण्डी’ है। आजकल लोग सिर के बाल कटा लेते हैं और सूत्र के नाम पर गले की जनेऊ हटा लेते हैं, अग्नि जलाना छोड़ देते हैं, हो गया संन्यास उनका। नहीं, वस्तुतः शिखा लक्ष्य का प्रतीक है, जिसे आपको पाना है और सूत्र है संस्कारों का। जब तक आगे परमात्मा को पाना शेष है, पीछे संस्कारों का सूत्रपात लगा हुआ है, तब तक त्याग कैसा? संन्यास कैसा? अभी तो चलनेवाले पथिक हैं। जब प्राप्तव्य प्राप्त हो जाय, पीछे लगे हुए संस्कारों की डोर कट जाय, ऐसी अवस्था में भ्रम सर्वथा शान्त हो जाता है। इसलिये शिखण्डी ही भ्रमरूपी भीष्म का विनाश करता है। शिखण्डी चिन्तन-पथ की विशिष्ट योग्यता है, महारथी है।

१४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ‘धृष्टद्युम्नः’– दृढ़ और अचल मन तथा ‘विराटः’– सर्वत्र विराट् ईश्वर का प्रसार देखने की क्षमता इत्यादि दैवी सम्पद् के प्रमुख गुण हैं। सात्त्विकता ही सात्यकि है। सत्य के चिन्तन की प्रवृत्ति अर्थात् सात्त्विकता यदि बनी है तो कभी गिरावट नहीं आने पायेगी। इस संघर्ष में पराजित नहीं होने देगी। द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते। सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।१८।। अचल पददायक द्रुपद और ध्यानरूपी द्रौपदी के पाँचों पुत्र– सहृदयता, वात्सल्य, लावण्य, सौम्यता, स्थिरता इत्यादि साधन में महान् सहायक महारथी हैं तथा बड़ी भुजावाला अभिमन्यु– इन सबने पृथक्-पृथक् शंख बजाये। भुजा कार्य-क्षेत्र का प्रतीक है। जब मन भय से रहित हो जाता है तो उसकी पहुँच दूर तक हो जाती है। हे राजन्! इन सबने अलग-अलग शंख बजाये। कुछ-न-कुछ दूरी सभी तय कराते हैं। इनका पालन आवश्यक है, इसलिये इनके नाम गिनाये। इसके अतिरिक्त कुछ दूरी ऐसी भी है जो मन-बुद्धि से परे है, भगवान स्वयं ही अन्तःकरण में विराजकर तय कराते हैं। इधर दृष्टि बनकर आत्मा से खड़े हो जाते हैं और सामने स्वयं खड़े होकर अपना परिचय करा लेते हैं। स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।।१९।। उस घोर शब्द ने आकाश और पृथिवी को भी शब्दायमान करते हुए धृतराष्ट्र-पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिये। सेना तो पाण्डवों की ओर भी थी, किन्तु हृदय विदीर्ण हुए धृतराष्ट्र-पुत्रों के। वस्तुतः पाञ्चजन्य, दैवी शक्ति पर आधिपत्य, अनन्त पर विजय, अशुभ का शमन और शुभ की घोषणा धारावाही होने लगे तो कुरुक्षेत्र, आसुरी सम्पद्, बहिर्मुखी प्रवृत्तियों का हृदय विदीर्ण हो जायेगा। उनका बल शनैः-शनैः क्षीण होने लगता है। सर्वथा सफलता मिलने पर मोहमयी प्रवृत्तियाँ सर्वथा शान्त हो जाती हैं। अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।२०।। हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।

प्रथम अध्याय १५ अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।।२१।। संयमरूपी संजय ने अज्ञान से आवृत्त मन को समझाया कि हे राजन्! इसके उपरान्त 'कपिध्वज:'- वैराग्यरूपी हनुमान, वैराग्य ही ध्वज है जिसका (ध्वज राष्ट्र का प्रतीक माना जाता है। कुछ लोग कहते हैं- ध्वजा चंचल थी, इसलिये कपिध्वज कहा गया। किन्तु नहीं, यहाँ कपि साधारण बन्दर नहीं स्वयं हनुमान थे, जिन्होंने मान-अपमान का हनन किया था- 'सम मानि निरादर आदरही।' (मानस, ७/१३/छन्द) प्रकृति की देखी-सुनी वस्तुओं से, विषयों से राग का त्याग ही 'वैराग्य' है। अतः वैराग्य ही जिसकी ध्वजा है) उस अर्जुन ने व्यवस्थित रूप से धृतराष्ट्र-पुत्रों को खड़े देखकर शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर 'हृषिकेशम्'-जो हृदय के सर्वज्ञाता हैं, उन योगेश्वर श्रीकृष्ण से यह वचन कहा- "हे अच्युत ! (जो कभी च्युत नहीं होता) मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करिये।" यहाँ सारथी को दिया गया आदेश नहीं, इष्ट (सद्गुरु) से की गयी प्रार्थना है। किसलिये खड़ा करें?- यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ।।२२।। जब तक मैं इन स्थित हुए युद्ध की कामनावालों को अच्छी प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है- इस युद्ध-व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है। योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः। धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।।२३।। दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में कल्याण चाहनेवाले जो-जो राजा लोग इस सेना में आये हैं, उन युद्ध करनेवालों को मैं देखूँगा, इसलिये खड़ा करें। मोहरूपी दुर्योधन। मोहमयी प्रवृत्तियों का कल्याण चाहनेवाले जो-जो राजा इस युद्ध में आये हैं, उनको मैं देख लूँ। सञ्जय उवाच एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ।।२४।।

१६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्। उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कूरूनिति।।२५।। संजय बोला- निद्राजयी अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृदय के ज्ञाता श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच भीष्म, द्रोण और 'महीक्षिताम्'- शरीररूपी पृथ्वी पर अधिकार जमाये हुए सम्पूर्ण राजाओं के बीच उत्तम रथ को खड़ा करके कहा- पार्थ! इन इकट्ठे हुए कौरवों को देख। यहाँ उत्तम रथ सोने-चाँदी का रथ नहीं है। संसार में उत्तम की परिभाषा नश्वर के प्रति अनुकूलता-प्रतिकूलता से की जाती है। यह परिभाषा अपूर्ण है। जो हमारे आत्मा, हमारे स्वरूप का सदैव साथ दे, वही उत्तम है। जिसके पीछे 'अनुत्तम'- मलिनता न हो। तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्। आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।२६।। श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि। इसके उपरान्त अचूक लक्ष्यवाले, पार्थिव शरीर को रथ बनानेवाले पार्थ ने उन दोनों सेनाओं में स्थित पिता के भाइयों को, पितामहों को, आचार्यों को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को, मित्रों को, श्वसुरों को और सुहृदों को देखा। दोनों सेनाओं में अर्जुन को केवल अपना परिवार, मामा का परिवार, ससुराल का परिवार, सुहृद् और गुरुजन दिखायी पड़े। महाभारतकाल की गणना के अनुसार अठारह अक्षौहिणी लगभग चालीस लाख के समकक्ष होता है; किन्तु प्रचलित गणना के अनुसार अठारह अक्षौहिणी साढ़े छः अरब के लगभग होता है, जो आज के विश्व की जनसंख्या के समकक्ष है। इतने मात्र के लिये यदा-कदा विश्वस्तर पर आवास एवं खाद्य-समस्या बन जाती है। इतना बड़ा जनसमूह अर्जुन के तीन-चार रिश्तेदारों का परिवार मात्र था। क्या इतना बड़ा भी किसी का परिवार होता है? कदापि नहीं! यह हृदय-देश का चित्रण है। तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।।२७।। कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।

प्रथम अध्याय १७ इस प्रकार खड़े हुए उन सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर अत्यन्त करुणा से आवृत्त वह कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ बोला। अर्जुन शोक करने लगा; क्योंकि उसने देखा कि यह सब तो अपना परिवार ही है, अतः बोला- अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।।२८।। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।२९।। हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छावाले खड़े हुए इस स्वजन-समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं, मुख सूखा जाता है और मेरे शरीर में कम्प तथा रोमाञ्च हो रहा है। इतना ही नहीं- गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।।३०।। हाथ से गाण्डीव गिरता है, त्वचा भी जल रही है। अर्जुन को ज्वर-सा हो आया। संतप्त हो उठा कि यह कैसा युद्ध है जिसमें स्वजन ही खड़े हैं? अर्जुन को भ्रम हो गया। वह कहता है- अब मैं खड़ा रह पाने में भी अपने को असमर्थ पा रहा हूँ, अब आगे देखने की सामर्थ्य नहीं है। निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।।३१।। हे केशव ! इस युद्ध का लक्षण भी विपरीत ही देखता हूँ। युद्ध में अपने कुल को मारकर परमकल्याण भी नहीं देखता हूँ। कुल को मारने से कल्याण कैसे होगा? न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।।३२।। सम्पूर्ण परिवार युद्ध के मुहाने पर है। इन्हें युद्ध में मारकर विजय, विजय से मिलनेवाला राज्य और राज्य से मिलनेवाला सुख अर्जुन को नहीं चाहिये। वह कहता है- कृष्ण ! मैं विजय नहीं चाहता। राज्य तथा सुख भी नहीं चाहता। गोविन्द ! हमें राज्य या भोग अथवा जीवन से भी क्या प्रयोजन है? क्यों? इस पर कहता है-

१८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।।३३।। हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादिक इच्छित हैं, वे ही परिवार जीवन की आशा त्यागकर युद्ध के मैदान में खड़े हैं। हमें राज्य इच्छित था तो परिवार को लेकर; भोग, सुख और धन की पिपासा थी तो स्वजन और परिवार के साथ उन्हें भोगने की थी। किन्तु जब सब-के-सब प्राणों की आशा त्यागकर खड़े हैं तो मुझे सुख, राज्य या भोग नहीं चाहिये। यह सब इन्हीं के लिये प्रिय थे। इनसे अलग होने पर हमें इनकी आवश्यकता नहीं है। जब तक परिवार रहेगा, तभी तक ये वासनाएँ भी रहती हैं। झोपड़ी में रहनेवाला भी अपने परिवार, मित्र और स्वजन को मारकर विश्व का साम्राज्य स्वीकार नहीं करेगा। अर्जुन भी यही कहता है कि हमें भोग प्रिय थे, विजय प्रिय थी; किन्तु जिनके लिये थी, जब वे ही नहीं रहेंगे तो भोगों से क्या प्रयोजन? इस युद्ध में मारना किसे है?- आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।।३४।। इस युद्ध में आचार्य, ताऊ- चाचे, लड़के और इसी प्रकार दादा, मामा, श्वसुर, पोते, साले तथा समस्त सम्बन्धी ही हैं। एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते।।३५।। हे मधुसूदन ! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये कहना ही क्या है? अठारह अक्षौहिणी सेना में अर्जुन को अपना परिवार ही दिखायी पड़ा। इतने अधिक स्वजन वास्तव में क्या हैं? वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है। भजन के आरम्भ में प्रत्येक अनुरागी के समक्ष यही समस्या रहती है। सभी चाहते हैं कि वे भजन करें, उस परमसत्य को पा लें; किन्तु किसी अनुभवी सद्गुरु के संरक्षण में कोई अनुरागी जब क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष को समझता है कि उसे किनसे लड़ना है, तो वह हताश हो जाता है। वह चाहता है कि उसके पिता का परिवार, ससुराल का परिवार, मामा का परिवार, सुहृद्, मित्र और गुरुजन साथ

प्रथम अध्याय १९ रहें, सभी सुखी रहें और इन सबकी व्यवस्था करते हुए वह परमात्म-स्वरूप की प्राप्ति भी कर ले। किन्तु जब वह समझता है कि आराधना में अग्रसर होने के लिये परिवार छोड़ना होगा, इन सम्बन्धों का मोह समाप्त करना होगा तो वह अधीर हो उठता है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे- "मरना और साधु होना बराबर है। साधु के लिये सृष्टि में दूसरा कोई जीवित है भी; किन्तु घरवालों के नाम पर कोई नहीं है। यदि कोई है तो लगाव है, मोह समाप्त कहाँ हुआ? जहाँ तक लगाव है उसका पूर्ण त्याग, उस लगाव के सहअस्तित्व मिटने पर ही उसकी विजय है। इन सम्बन्धों का प्रसार ही तो जगत् है, अन्यथा जगत् में हमारा क्या है?" 'तुलसिदास कह चिद-बिलास जग बूझत बूझत बूझै।' (विनयपत्रिका, १२४) मन का प्रसार ही जगत् है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी मन के प्रसार को ही जगत् कहकर सम्बोधित किया है। जिसने इसके प्रभाव को रोक लिया, उसने चराचर जगत् ही जीत लिया- 'इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।' (गीता, ५/१९) केवल अर्जुन ही अधीर था, ऐसी बात नहीं है। अनुराग सबके हृदय में है। प्रत्येक अनुरागी अधीर होता है, उसे सम्बन्धी याद आने लगते हैं। पहले वह सोचता था कि भजन से कुछ लाभ होगा तो ये सब सुखी होंगे। इनके साथ रहकर उसे भोगेंगे। जब ये साथ ही नहीं रहेंगे तो सुख लेकर क्या करेंगे? अर्जुन की दृष्टि राज्यसुख तक ही सीमित थी। वह त्रिलोकी के साम्राज्य को ही सुख की पराकाष्ठा समझता था। इसके आगे भी कोई सत्य है, इसकी जानकारी अर्जुन को अभी नहीं है। निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानातातयिनः ॥३६॥ हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर भी हमें क्या प्रसन्नता होगी? जहाँ धृतराष्ट्र अर्थात् धृष्टता का राष्ट्र है, उससे उत्पन्न मोहरूपी दुर्योधन इत्यादि को मारकर भी हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर हमें पाप ही तो लगेगा। जो जीवनयापन के तुच्छ लाभ के लिये अनीति अपनाता है, वह आततायी कहलाता है; किन्तु वस्तुतः इससे भी बड़ा आततायी वह है, जो

२० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता आत्मा के पथ में अवरोध उत्पन्न करता है। आत्मदर्शन में बाधक काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का समूह ही आततायी है। तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।। ३७ ।। इससे हे माधव! अपने बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं। स्व-बान्धव कैसे? वे तो शत्रु थे न! वस्तुतः शरीर के रिश्ते अज्ञान से उत्पन्न होते हैं। यह मामा हैं, ससुराल है, स्वजन-समुदाय है- यह सब अज्ञान ही तो है। जब शरीर ही नश्वर है, तब इसके रिश्ते ही कहाँ रहेंगे? मोह है तभी तक सुहृद् हैं, हमारा परिवार है, हमारी दुनिया है। मोह नहीं तो कुछ भी नहीं। इसीलिये वे शत्रु भी अर्जुन को स्वजन दिखायी पड़े। वह कहता है कि अपने कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे? यदि अज्ञान और मोह न रहे तो कुटुम्ब का अस्तित्व न हो। यह अज्ञान ज्ञान का प्रेरक भी है। भर्तृहरि, तुलसी इत्यादि अनेक महानुभावों को वैराग्य की प्रेरणा पत्नी से मिली, तो कोई सौतेली माँ के व्यवहार से खिन्न होकर वैराग्य-पथ पर अग्रसर हुआ दिखायी देता है। यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।।३८।। यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुलनाश के दोष और मित्रद्रोह के पाप को नहीं देखते हैं, यह उनकी कमी है; फिर भी- कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।३९।। हे जनार्दन! कुलनाश से होनेवाले दोषों को जाननेवाले हमलोगों को इस पाप से हटने के लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये? मैं ही पाप करता हूँ, ऐसी बात नहीं, आप भी भूल करने जा रहे हैं- श्रीकृष्ण पर भी आरोप लगाया। अभी वह समझ में अपने को श्रीकृष्ण से कम नहीं मानता। प्रत्येक नया साधक सद्गुरु की शरण जाने पर इसी प्रकार तर्क करता है और अपने को जानकारी में कम नहीं समझता। यही अर्जुन भी कहता है कि ये भले न समझें, किन्तु हम-आप तो समझदार हैं। कुलनाश के दोषों पर हमें विचार करना चाहिये। कुलनाश में दोष क्या है?-

प्रथम अध्याय २१ कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ।।४०।। कुल के नाश होने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। अर्जुन कुलधर्म, कुलाचार को ही सनातन-धर्म समझ रहा था। धर्म के नाश होने पर सम्पूर्ण कुल को पाप भी बहुत दबा लेता है। अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ।।४१।। हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। अर्जुन की मान्यता थी कि कुल की स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर होता है; किन्तु श्रीकृष्ण ने इसका खण्डन करते हुए आगे बताया कि मैं अथवा स्वरूप में स्थित महापुरुष यदि आराधना-क्रम में भ्रम उत्पन्न कर दें, तब वर्णसंकर होता है। वर्णसंकर के दोषों पर अर्जुन प्रकाश डालता है- सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ।।४२।। वर्णसंकर कुलघातियों और कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्डोदक क्रियावाले इनके पितर लोग भी गिर जाते हैं। वर्तमान नष्ट हो जाता है, अतीत के पितर गिर जाते हैं और भविष्यवाले भी गिरेंगे। इतना ही नहीं, दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ।।४३।। इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुल और कुलघातियों के सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं। अर्जुन मानता था कि कुलधर्म सनातन है, कुलधर्म ही शाश्वत है। किन्तु श्रीकृष्ण ने इसका खण्डन किया और आगे बताया कि आत्मा ही सनातन-शाश्वत धर्म है। वास्तविक सनातन-धर्म को जानने से पहले मनुष्य धर्म के नाम पर किसी-न-किसी रूढ़ि को जानता है। ठीक इसी प्रकार अर्जुन भी जानता है, जो श्रीकृष्ण के शब्दों में एक रूढ़ि है।

२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।।४४।। हे जनार्दन ! नष्ट हुए कुलधर्मवाले मनुष्यों का अनन्तकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हमने सुना है। केवल कुलधर्म ही नहीं नष्ट होता, बल्कि शाश्वत-सनातन धर्म भी नष्ट हो जाता है। जब धर्म ही नष्ट हो गया, तब ऐसे पुरुष का अनन्तकाल तक नरक में निवास होता है, ऐसा हमने सुना है। देखा नहीं, सुना है। अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।।४५।। अहो ! शोक है कि हमलोग बुद्धिमान् होकर भी महान् पाप करने को तैयार हुए हैं। राज्य और सुख के लोभ से अपने कुल को मारने के लिये उद्यत हुए हैं। अभी अर्जुन अपने को कम ज्ञाता नहीं समझता। आरम्भ में प्रत्येक साधक इसी प्रकार बोलता है। महात्मा बुद्ध का कथन है कि मनुष्य जब अधूरी जानकारी रखता है तो अपने को महान् ज्ञानी समझता है और जब आधे से आगे की जानकारी हासिल करने लगता है तो अपने को महान् मूर्ख समझता है। ठीक इसी प्रकार अर्जुन भी अपने को ज्ञानी ही समझता है। वह श्रीकृष्ण को ही समझाता है कि इस पाप से परमकल्याण हो- ऐसी बात भी नहीं, केवल राज्य और सुख के लोभ में पड़कर हमलोग कुलनाश करने को उद्यत हुए हैं- महान् भूल कर रहे हैं। हम ही भूल कर रहे हैं- ऐसी बात नहीं, आप भी भूल कर रहे हैं। एक धक्का श्रीकृष्ण को भी दिया। अन्त में अर्जुन अपना निर्णय देता है- यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्।।४६।। यदि मुझ शस्त्ररहित, सामना न करनेवाले को शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मारें तो उनका वह मारना भी मेरे लिये अतिकल्याणकारी होगा। इतिहास तो कहेगा कि अर्जुन समझदार था, जिसने अपनी बलि देकर युद्ध बचा लिया। लोग प्राणों की आहुति दे डालते हैं कि भोले-भाले मासूम बच्चे सुखी रहें, कुल तो बचा रहे। मनुष्य विदेश चला जाय, वैभवपूर्ण प्रासाद में रहे; किन्तु दो दिन बाद उसे अपनी छोड़ी हुई झोपड़ी याद आने लगती है। मोह

प्रथम अध्याय २३ इतना प्रबल होता है। इसीलिये अर्जुन कहता है कि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ न प्रतिकार करनेवाले को रण में मार दें, तब भी वह मेरे लिये अतिकल्याणकारी होगा ताकि लड़के तो सुखी रहें। सञ्जय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंव्रिग्नमानसः।।४७।। संजय बोला कि रणभूमि में शोक से उद्विग्न मनवाला अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष में भाग लेने से पीछे हट गया। निष्कर्ष- गीता क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के युद्ध का निरूपण है। यह ईश्वरीय विभूतियों से सम्पन्न भगवत्-स्वरूप को दिखानेवाला गायन है। यह गायन जिस क्षेत्र में होता है, वह युद्धक्षेत्र शरीर है। जिसमें दो प्रवृत्तियाँ हैं- धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र। उन सेनाओं का स्वरूप और उनके बल का आधार बताया, शंखध्वनि से उनके पराक्रम की जानकारी मिली। तदनन्तर जिस सेना से लड़ना है, उसका निरीक्षण हुआ। जिसकी गणना अठारह अक्षौहिणी (लगभग साढ़े छः अरब) कही जाती है; किन्तु वस्तुतः वे अनन्त हैं। प्रकृति के दृष्टिकोण दो हैं- एक इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति 'दैवी सम्पद्', दूसरी बहिर्मुखी प्रवृत्ति 'आसुरी सम्पद्'। दोनों प्रकृति ही हैं। एक इष्ट की ओर उन्मुख करती है, परमधर्म परमात्मा की ओर ले जाती है और दूसरी प्रकृति में विश्वास दिलाती है। पहले दैवी सम्पद् को साधकर आसुरी सम्पद् का अन्त किया जाता है, फिर शाश्वत-सनातन परब्रह्म के दिग्दर्शन और उसमें स्थिति के साथ दैवी सम्पद् की आवश्यकता शेष हो जाती है, युद्ध का परिणाम निकल आता है। अर्जुन को सैन्य निरीक्षण में अपना परिवार ही दिखायी पड़ता है, जिसे मारना है। जहाँ तक सम्बन्ध है, उतना ही जगत् है। अनुराग के प्रथम चरण में पारिवारिक मोह बाधक बनता है। साधक जब देखता है कि मधुर सम्बन्धों से इतना विच्छेद हो जायेगा, जैसे वे थे ही नहीं, तो उसे घबराहट होने लगती है। स्वजनासक्ति को मारने में उसे अकल्याण दिखायी देने लगता है। वह प्रचलित

२४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता रूढ़ियों में अपना बचाव ढूँढ़ने लगता है, जैसा अर्जुन ने किया। उसने कहा- 'कुलधर्म ही सनातन-धर्म है। इस युद्ध से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा, कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर पैदा होगा, जो कुल और कुलघातियों को अनन्तकाल तक नरक में ले जाने के लिये ही होता है।' अर्जुन अपनी समझ से सनातन-धर्म की रक्षा के लिये विकल है। उसने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि हमलोग समझदार होकर भी यह महान् पाप क्यों करें? अर्थात् श्रीकृष्ण भी पाप करने जा रहे हैं। अन्ततोगत्वा पाप से बचने के लिये 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'- ऐसा कहता हुआ हताश अर्जुन रथ के पिछले भाग में बैठ गया। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष से पीछे हट गया। टीकाकारों ने इस अध्याय को 'अर्जुन-विषाद योग' कहा है। अर्जुन अनुराग का प्रतीक है। सनातन-धर्म के लिये विकल होनेवाले अनुरागी का विषाद योग का कारण बनता है। यही विषाद मनु को हुआ था- 'हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।' (रामचरितमानस, १/१४२) संशय में पड़कर ही मनुष्य विषाद करता है। उसे सन्देह था कि वर्णसंकर पैदा होगा, जो नरक में ले जायेगा। सनातन-धर्म के नष्ट होने का भी उसे विषाद था। अतः 'संशय-विषाद योग' का सामान्य नामकरण इस अध्याय के लिये उपयुक्त है। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'संशयविषादयोगो' नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में 'संशय-विषाद योग' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'संशयविषादयोगो' नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'संशय-विषाद योग' नामक पहला अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

द्वितीयोऽध्यायः कर्मजिज्ञासा

।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।। ।। अथ द्वितीयोऽध्यायः ।। प्रथम अध्याय गीता की प्रवेशिका है, जिसमें आरम्भ में पथिक को प्रतीत होनेवाली उलझनों का चित्रण है। लड़नेवाले सम्पूर्ण कौरव और पाण्डव हैं; किन्तु संशय का पात्र मात्र अर्जुन है। अनुराग ही अर्जुन है। इष्ट के अनुरूप राग ही पथिक को क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष के लिये प्रेरित करता है। अनुराग आरम्भिक स्तर है। 'पूज्य महाराज जी' कहते थे- “सद्गृहस्थ आश्रम में रहते हुए ग्लानि होने लगे, अश्रुपात होता हो, कण्ठ अवरुद्ध होता हो तो समझना कि यहीं से भजन आरम्भ हो गया।” अनुराग में यह सब कुछ आ जाता है। उसमें धर्म, नियम, सत्संग, भाव सभी विद्यमान होंगे। अनुराग के प्रथम चरण में पारिवारिक मोह बाधक बनता है। पहले मनुष्य चाहता है कि वह उस परम सत्य को प्राप्त कर ले; किन्तु आगे बढ़ने पर वह देखता है कि इन मधुर सम्बन्धों का उच्छेद करना होगा, तब हताश हो जाता है। वह पहले से जो कुछ धर्म-कर्म मानकर करता था, उतने में ही सन्तोष करने लगता है। अपने मोह की पुष्टि के लिये वह प्रचलित रूढ़ियों का प्रमाण भी प्रस्तुत करता है- जैसा अर्जुन ने किया कि कुलधर्म सनातन है। युद्ध से सनातन-धर्म का लोप होगा, कुलक्षय होगा, स्वैराचार फैलेगा। यह अर्जुन का उत्तर नहीं था, बल्कि सद्गुरु के सान्निध्य से पूर्व अपनायी गयी एक कुरीति मात्र थी। इन्हीं कुरीतियों में फँसकर मनुष्य पृथक्-पृथक् धर्म, अनेक सम्प्रदाय, छोटे-बड़े गुट और असंख्य जातियों की रचना कर लेता है। कोई नाक दबाता है, तो कोई कान फाड़ता है। किसी के छूने से धर्म नष्ट होता है, तो कहीं रोटी- पानी से धर्म नष्ट होता है। तो क्या अछूत या छूनेवालों का दोष है? कदापि

२६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता नहीं ! दोष हमारे भ्रमदाताओं का है। धर्म के नाम पर हम कुरीति के शिकार हैं, इसलिये दोष हमारा है। महात्मा बुद्ध के समय में केश-कम्बल एक सम्प्रदाय था, जिसमें केश को बढ़ाकर कम्बल की तरह प्रयोग करने को पूर्णता का मानदण्ड माना जाता था। कोई गोव्रतिक (गाय की भाँति रहनेवाला) था, तो कोई कुक्कुरव्रतिक (कुत्ते की तरह खाने-पीने, रहनेवाला) था। ब्रह्मविद्या का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है। सम्प्रदाय और कुरीतियाँ पहले भी थीं, आज भी हैं। ठीक इसी प्रकार कृष्णकाल में भी सम्प्रदाय थे, कुरीतियाँ थीं। उनमें से एकाध कुरीति का शिकार अर्जुन भी था। उसने चार तर्क प्रस्तुत किये- १. ऐसे युद्ध से सनातन- धर्म नष्ट हो जायेगा, २. वर्णसंकर पैदा होगा, ३. पिण्डोदक क्रिया लुप्त होगी, और ४. हमलोग कुलक्षय द्वारा महान् पाप करने को उद्यत हुए हैं। सञ्जय उवाच तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।१।। संजय ने कहा- करुणा से व्याप्त, अश्रुपूर्ण व्याकुल नेत्रोंवाले उस अर्जुन के प्रति 'मधुसूदन'- मद का विनाश करनेवाले भगवान ने यह वचन कहा- श्रीभगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।२।। अर्जुन ! इस विषम स्थल में तुझे यह अज्ञान कहाँ से हो गया? विषम स्थल अर्थात् जिसकी समता का सृष्टि में कोई स्थल है ही नहीं, पारलौकिक है लक्ष्य जिसका, ऐसे निर्विवाद स्थल पर तुझे अज्ञान कहाँ से हुआ? अज्ञान क्यों, अर्जुन तो सनातन-धर्म की रक्षा के लिये कटिबद्ध है। क्या सनातन-धर्म की रक्षा के लिये प्राण-पण से तत्पर होना अज्ञान है? श्रीकृष्ण कहते हैं- हाँ, यह अज्ञान है। न तो सम्भावित पुरुषों द्वारा इसका आचरण किया गया है, न

द्वितीय अध्याय २७ यह स्वर्ग ही देनेवाला है और न यह कीर्ति को ही करनेवाला है। सन्मार्ग पर जो दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है, उसे आर्य कहते हैं। गीता आर्यसंहिता है। परिवार के लिये मरना-मिटना यदि अज्ञान न होता तो महापुरुष उस पर अवश्य चले होते। यदि कुलधर्म ही सत्य होता तो स्वर्ग और कल्याण की निःश्रेणी अवश्य बनती। यह कीर्तिदायक भी नहीं है। मीरा भजन करने लगी, तो ‘लोग कहें मीरा भई बावरी, सास कहे कुलनाशी रे।’ जिस परिवार, कुल और मर्यादा के लिये मीरा की सास बिलख रही थी, आज उस कुलवन्ती सास को कोई नहीं जानता, मीरा को विश्व जानता है। ठीक इसी प्रकार परिवार के लिये जो परेशान हैं, उनकी भी कीर्ति कब तक रहेगी? जिसमें कीर्ति नहीं, कल्याण नहीं, श्रेष्ठ पुरुषों ने भूलकर भी जिसका आचरण नहीं किया तो सिद्ध है कि वह अज्ञान है। अतः- क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३॥ अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो। क्या अर्जुन नपुंसक था? क्या आप पुरुष हैं? नपुंसक वह है, जो पौरुष से हीन हो। सब अपनी समझ से पुरुषार्थ ही तो करते हैं। किसान रात-दिन खून-पसीना एक करके खेत में पुरुषार्थ ही तो करता है। कोई व्यापार में पुरुषार्थ समझता है, तो कोई पद का दुरुपयोग करके पुरुषार्थी बनता है। जीवनभर पुरुषार्थ करने पर भी खाली हाथ जाना पड़ता है। स्पष्ट है कि यह पुरुषार्थ नहीं है। शुद्ध पुरुषार्थ है ‘आत्मदर्शन’। गार्गी ने याज्ञवल्क्य से कहा- नपुंसकः पुमान् ज्ञेयो यो न वेत्ति हृदि स्थितम्। पुरुषं स्वप्रकाशं तमानन्दात्मानमव्ययम्।। ( आत्मपुराण ) वह पुरुष होते हुए भी नपुंसक है, जो हृदयस्थ आत्मा को नहीं पहचानता। वह आत्मा ही पुरुषस्वरूप, स्वयंप्रकाश, उत्तम, आनन्दयुक्त और अव्यक्त है। उसे पाने का प्रयास ही पौरुष है। अर्जुन ! तू नपुंसकता को न प्राप्त हो, यह तेरे योग्य नहीं है। हे परंतप ! हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो। आसक्ति का

२८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता त्याग करो। यह हृदय की दुर्बलता मात्र है। इस पर अर्जुन ने तीसरा प्रश्न प्रस्तुत किया- अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।४।। अहंकार का शमन करनेवाले मधुसूदन! मैं रणभूमि में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण से किस प्रकार बाणों से युद्ध करूँगा? क्योंकि अरिसूदन ! वे दोनों ही पूजनीय हैं। द्वैत ही द्रोण है। प्रभु अलग हैं, हम अलग हैं-द्वैत का यह भान ही प्राप्ति की प्रेरणा का आरम्भिक स्रोत है। यही द्रोणाचार्य का गुरुत्व है। भ्रम ही भीष्म है। जब तक भ्रम है तभी तक बच्चे, परिवार, रिश्तेदार सभी अपने लगते हैं। अपना लगने में भ्रम ही माध्यम है। आत्मा इन्हीं को पूज्य मानकर इनके साथ रहता है कि यह पिता हैं, दादा हैं, कुलगुरु हैं इत्यादि। साधन के पूर्तिकाल में 'गुरु न चेला, पुरुष अकेला।' न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।। ( आत्मषट्क, ५ ) जब चित्त उस परम आनन्द में विलीन हो जाता है, तब न गुरु ज्ञानदाता और न शिष्य ग्रहणकर्त्ता ही रह जाता है। यही परम की स्थिति है। गुरु का गुरुत्व प्राप्त कर लेने पर गुरुत्व एक-जैसा हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, “अर्जुन ! तू मुझमें निवास करेगा।” जैसे श्रीकृष्ण वैसा ही अर्जुन, और ठीक वैसा ही प्राप्तिवाला महापुरुष हो जाता है। ऐसी अवस्था में गुरु का भी विलय हो जाता है, गुरुत्व हृदय में प्रवाहित हो जाता है। अर्जुन गुरु-पद की ढाल बनाकर इस संघर्ष में प्रवृत्त होने से कतराना चाहता है। वह कहता है- गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्धिरप्रदिग्धान्।।५।।

द्वितीय अध्याय २९ इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी श्रेयस्कर समझता हूँ। यहाँ भिक्षा का अर्थ उदर-पोषण के लिये भीख माँगना नहीं बल्कि सत्पुरुषों की टूटी-फूटी सेवा द्वारा उनसे कल्याण की याचना ही भिक्षा है। 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।' (तैत्तिरीय उप०, भृगुबल्ली २) अन्न एकमात्र परमात्मा है, जिसे प्राप्त करके आत्मा सदा के लिये तृप्त हो जाता है, कभी अतृप्त नहीं रहता। हम महापुरुषों की सेवा और याचना द्वारा शनैः-शनैः ब्रह्मपीयूष प्राप्त करें; किन्तु यह परिवार न छूटे, यही अर्जुन के भिक्षान्न की कामना है। संसार में अधिकांश लोग ऐसा ही करते हैं। वे चाहते हैं कि पारिवारिक स्नेह-सम्बन्ध न मारना पड़े और मुक्ति भी शनैः-शनैः मिल जाय। किन्तु चलनेवाले पथिक के लिये, जिसके संस्कार इनसे ऊपर हैं, जिसमें संघर्ष की क्षमता है, स्वभाव में क्षत्रियत्व प्रवाहित है, उसके लिये इस भिक्षान्न का विधान नहीं है। स्वयं न करके याचना करना भिक्षान्न है। गौतम बुद्ध ने भी मज्झिम निकाय के धम्मदायाद सुत्त (१/१/३) में इस भिक्षान्न को आमिष-दायाद कहकर हेय माना है, जबकि शरीरयापन से सभी भिक्षु थे। इन गुरुजनों को मारकर मिलेगा क्या? इस लोक में रुधिर से सने अर्थ और काम के भोग ही तो भोगने को मिलेंगे। अर्जुन कदाचित् सोचता था कि भजन से भौतिक सुखों की मात्रा में अभिवृद्धि होगी। इतना संघर्ष झेलने के बाद भी इस शरीर के पोषक अर्थ और काम के भोग ही तो मिलेंगे। वह पुनः तर्क देता है- न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६॥ यह भी निश्चित नहीं है कि वह भोग मिलेगा ही। यह भी हम नहीं जानते कि हमारे लिये क्या करना श्रेयस्कर है; क्योंकि जो कुछ हमने कहा, वह अज्ञान प्रमाणित हो गया। यह भी ज्ञात नहीं है कि हम जीतेंगे अथवा वे ही जीतेंगे। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे

३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सामने खड़े हैं। जब अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र से उत्पन्न मोह इत्यादि स्वजन-समुदाय मिट ही जायेंगे, तब हम जी कर ही क्या करेंगे? अर्जुन पुनः सोचता है कि जो कुछ हमने कहा, कदाचित् यह भी अज्ञान हो; अतः प्रार्थना करता है- कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७॥ कायरता के दोष से नष्ट स्वभाववाला, धर्म के विषय में सर्वथा मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ। जो कुछ निश्चित परम कल्याणकारी हो, वह साधन मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, मुझे साधिये। केवल शिक्षा न दीजिये, बल्कि जहाँ लड़खड़ाऊँ वहाँ सँभालिये। 'लाद दे लदाय दे और लदानेवाला साथ चले- कदाचित् गट्ठर गिर पड़ा, तब कौन लदवायेगा?'-ऐसा ही समर्पण अर्जुन का है। यहाँ अर्जुन ने पूर्ण समर्पण कर दिया। अभी तक वह श्रीकृष्ण को अपने स्तर का ही समझता था, अनेक विद्याओं में अपने को कुछ आगे ही मानता था। यहाँ उसने अपनी बागडोर श्रीकृष्ण को वस्तुतः सौंप दी। सद्गुरु पूर्तिपर्यन्त हृदय में रहकर साधक के साथ चलते हैं। यदि वे साथ न रहें तो साधक पार न हो। युवा कन्या के परिवारवाले जिस प्रकार शादी-विवाह तक उसको संयम की शिक्षा देते हुए सँभाल ले जाते हैं, ठीक इसी प्रकार सद्गुरु अपने शिष्य की अन्तरात्मा से रथी होकर उसे प्रकृति की घाटियों से निकालकर पार कर देते हैं। अर्जुन निवेदन करता है कि- भगवन्! एक बात और है- न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८॥ भूमि पर निष्कण्टक धन-धान्यसम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपन इन्द्रपद को पाकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता, जो मेरी इन्द्रियों

द्वितीय अध्याय ३१ को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके। जब शोक बना ही है तो यह सब लेकर ही मैं क्या करूँगा? यदि इतना ही मिलना है तो क्षमा करें। अर्जुन ने सोचा, अब इसके आगे बतायेंगे भी क्या? सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।९।। संजय बोला- हे राजन्! मोहनिशाजयी अर्जुन ने हृदय के सर्वज्ञ श्रीकृष्ण से यह कहकर कि ‘गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा’ चुप हो गया। अभी तक अर्जुन की दृष्टि पौराणिक है, जिसमें कर्मकाण्डों के साथ भोगों की उपलब्धि का विधान है, जिसमें स्वर्ग ही सब कुछ माना जाता है- जिस पर श्रीकृष्ण प्रकाश डालेंगे कि यह विचारधारा भी गलत है। तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।१०।। उसके उपरान्त हे राजन्! अन्तर्यामी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस शोकयुक्त अर्जुन को हँसते हुए-से यह वचन कहा- श्रीभगवानुवाच अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।११।। अर्जुन! तू न शोक करने योग्यों के लिये शोक करता है और पण्डितों के-से वचन कहता है; किन्तु बुद्धिसम्पन्न पण्डितजन जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये तथा जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी शोक नहीं करते; क्योंकि वे भी मर जायेंगे। तू पण्डितों-जैसी बातें भर करता है, वस्तुतः ज्ञाता है नहीं; क्योंकि- न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।१२।।

३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता न तो ऐसा ही है कि मैं अर्थात् सद्गुरु किसी काल में नहीं था अथवा तू अनुरागी अधिकारी अथवा ‘जनाधिपाः’– राजा लोग अर्थात् राजसी वृत्ति में पाया जानेवाला अहं नहीं था और न ऐसा ही है कि आगे हम सब नहीं रहेंगे। सद्गुरु सदैव रहता है, अनुरागी सदैव रहते हैं। यहाँ योगेश्वर ने योग की अनादिता पर प्रकाश डालते हुए भविष्य में भी उसकी विद्यमानता पर बल दिया। मरनेवालों के लिये शोक न करने के लिये कारण बताते हुए उन्होंने कहा- देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।१३।। जैसे जीवात्मा की इस देह में कुमार, युवा और वृद्ध अवस्था होती है, वैसे ही अन्य-अन्य शरीरों की प्राप्ति में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है। कभी आप बालक थे, शनैः-शनैः युवा हुए, तब आप मर तो नहीं गये? पुनः वृद्ध हुए। पुरुष एक ही है, उसी प्रकार लेशमात्र भी दरार नये देह की प्राप्ति पर नहीं पड़ती। कलेवर का यह परिवर्तन तब तक चलेगा, जब तक परिवर्तन से परे की वस्तु नहीं मिल जाती। मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।१४।। हे कुन्तीपुत्र! सुख, दुःख, सर्दी और गर्मी को देनेवाले इन्द्रियों और विषयों के संयोग तो अनित्य हैं, क्षणभंगुर हैं। अतः भरतवंशी अर्जुन! तू इनका त्याग कर। अर्जुन इन्द्रिय और विषय के संयोगजन्य सुख का स्मरण करके ही विकल था। कुलधर्म, कुलगुरुओं की पूज्यता इत्यादि इन्द्रियों के लगाव के अन्तर्गत हैं। ये क्षणिक हैं, झूठे हैं, नाशवान् हैं। विषयों का संयोग न सदैव मिलेगा और न सदैव इन्द्रियों में क्षमता ही रहेगी। अतः अर्जुन! तू इनका त्याग कर, सहन कर। क्यों? क्या हिमालय की लड़ाई थी जो अर्जुन सर्दी सहन करता अथवा क्या यह रेगिस्तान की लड़ाई है जहाँ अर्जुन गर्मी सहन करे? ‘कुरुक्षेत्र’ जैसा कि लोग बाहर बताते हैं, समशीतोष्ण स्थली है। कुल अठारह दिन तो लड़ाई हुई, इतने में कहाँ जाड़ा-गर्मी बीत गया? वस्तुतः सर्दी-गर्मी,