भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

मुमुक्षु प्रकरण । १२१

कैसे हुई। जैसे रस्सी में सर्प, सीप में रूपा, सूर्य की किरणों में जल, आकाश में तरुवर और दूसरा चन्द्रमा; गन्धर्वनगर और मनोराज की सृष्टि भासती है और जैसे समुद्र में तरङ्ग, आकाश में नीलता और नौका में बैठने से किनारे के वृक्ष और पर्वत चलते दृष्टि आते हैं एवम् जैसे बादल के चलने से चन्द्रमा धावता दीखता है, स्तम्भ में पुतली भासती है और भविष्यत् नगर से आदि ले असत्य पदार्थ सत्य भासते हैं वैसे ही सब जगत् है। अज्ञान से अर्थाकार भासता है और अज्ञान से ही इसकी उत्पत्ति दीखती है और ज्ञान में लीन हो जाता है जैसे निद्रा में स्वप्नसृष्टि की उत्पत्ति होती है और जागने से निवृत्त हो जाती है वैसे ही अविद्या में जगत् की उत्पत्ति होती है और सम्यक्ज्ञान में निवृत्त हो जाती है वह अविद्या कुछ वस्तु ही नहीं है। सर्व ब्रह्म, जो चिदाकाश-रूप शुद्ध, अनन्त और परमानन्दस्वरूप है उससे न जगत् उपजता है और न लीन होता है—ज्यों का त्यों आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। उसमें जगत् ऐसा है जैसे भीत में चित्र होता है जैसे स्तम्भ में पुतलियाँ होती हैं जो हुए बिना भासती हैं वैसे ही यह सृष्टि मन में है वास्तव में कुछ बनी नहीं—सब आकाशरूप है। जब चित्तसंवेदन स्पन्द-रूप होता है तब नाना प्रकार का जगत् होके भासता है और जब निस्पन्द होता है तब मिट जाता है। इस प्रकार से जगत् की उत्पत्ति कही है। उसके अनन्तर स्थिति प्रकरण है, उसमें जगत् की स्थिति कही है। जैसे इन्द्र के धनुष में अविचार से रङ्ग है और जैसे सूर्य की किरणों में जल और रस्सी में सर्प भासता है और वह सब सम्यक् दृष्टि से निवृत्त होता है वैसे ही अज्ञान में जगत् की प्रतीति होती है केवल मनोराज से ही जगत् रच लेता है—कुछ उत्पन्न नहीं हुआ है। यह जगत् संकल्पमात्र है। जैसे जब तक मनोराज तब तक वह नगर होता है जब मनोराज का अभाव हुआ तब नगर का भी अभाव हो जाता है वैसे ही जब तक अज्ञान है तब तक जगत् की उत्पत्ति होती है जब संकल्प का लय होता है तब जगत् का भी अभाव हो जाता है। जैसे ब्रह्माजी के दश पुत्रों की सृष्टि संकल्प से हुई थी वैसे ही यह