सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1211, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1211
४०४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

और जितने कुछ भावरूप पदार्थ स्थित हैं, वे अभाव हो जावेंगे। हे 
अङ्ग! जिस पुरुष ने विचारकर आत्मपद पाने का यत्न किया है, वह 
पावेगा और जिसने कहा कि मैं मुक्त हो रहूँगा और ईश्वर मुझ पर दया 
करेंगे, वह पुरुष कभी मुक्त न होगा। पुरुष के प्रयत्न बिना कभी 
मुक्ति न होगी। आत्मस्वरूप में न कोई दुःख है और न किसी गुण में 
मिला हुआ सुख है। वह केवल शान्तरूप है। किसी से किसी को कुछ 
सुख-दुःख नहीं; न सुख है और न दुःख है, न कोई कर्त्ता है और न 
भोक्ता है, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शताधिकषट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर! जैसे कोई कल्पना करे कि आकाश 
में अन्य आकाश स्थित है तो वह मिथ्या प्रतीति है, वैसे ही आत्मा में 
जो अहङ्कार उठता है वह मिथ्या है। जैसे आकाश में अन्य आकाश 
कुछ वस्तु नहीं; परमार्थ तत्त्व ऐसा सूक्ष्म है कि उसमें आकाश भी 
स्थूल है। वह ऐसा स्थूल है कि उसके आगे सुमेरु आदिक भी सूक्ष्म 
आगुण है। राग-द्वेष से रहित चैतन्य केवल शान्तरूप है—गुण और 
तत्त्व के क्षोभ से रहित है। हे देवपुत्र! निजानुभवरूपी चन्द्रमा अमृत 
का बरसानेवाला है। हे अङ्ग! जितने दृश्य पदार्थ दिखते हैं, वे हुए 
कुछ नहीं। हे अङ्ग! आत्मरूप अमृत की भावना कर, जिससे तू जन्म-
मरण के बन्धन से मुक्त हो। जैसे आकाश में दूसरे आकाश की कल्पना 
मिथ्या है, वैसे ही निराकार चिदात्मा में अहं मिथ्या है। और जैसे 
आकाश अपने आपमें स्थित है वैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित 
और अहं-त्वं आदि से रहित है। जब उसमें अहं का उत्थान होता है, 
तब जगत फैल जाता है—जैसे वायु जब फुग्ने में रहित होती है, तब 
आकाशरूप हो जाती है, वैसे ही गंगित उत्थान अहं में रहित होने पर 
आत्मरूप हो जाती है और जगत का भ्रम मिट जाता है।

फुग्ने में जगत फुर आया है; वास्तव में कुछ नहीं है। ज्ञानवान् को 
आत्मा ही भासित होता है। देश, काल, बुद्धि, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, 
कांति सब आकाशरूप हैं—ब्रह्मरूपी चन्द्रमा के प्रकाश से प्रकाशमान
योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1211, कुल 1734 में से · BharatKosha