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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1213, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1213

५०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

करके नष्ट होगा। जो यह उपाय न कर सको तो यह युक्ति करो कि जिसमें चित्त अभिलाषा करके आसक्त हो, उसी का त्याग करो। एक भाग अविद्या इस प्रकार नष्ट होगी। तीन भाग शास्त्र-विचार और अपने यत्न से शनैः-शनैः नष्ट होवेगा। साधुसंग, सत्शास्त्र-विचार और अपना यत्न हो तो एकबारगी अविद्या नष्ट हो जावेगी। ये समकाल कहे हैं। एक-एक के सेवने में एक-एक भाग निवृत्त होता है। पीछे जो शेष रहता है, उसमें काम-अर्थ सब असतरूप हैं और वे अजर, अनन्त, एकरूप हैं। संकल्प के उपजने से पदार्थ भासित होते हैं और संकल्प के लीन होने पर लीन हो जाते हैं। हे विद्याधर! यह जगत् संकल्प ने रचा है-जैसे आकाश में सूर्य निराधार स्थित होता है, वैसे ही देश-काल की अपेक्षा से रहित यह मननमात्र स्थित है। तीनों जगत् मन के फुरने से प्रकट होते हैं और मन के लय होने में लय हो जाते हैं-जैसे स्वप्न के पदार्थ जागने में मिट जाते हैं। हे विद्याधर! ब्रह्मरूपी वन में एक कल्पवृक्ष है, जिसकी अनेक शाखाएँ हैं। उसकी एक शाखा में जगतरूपी गूलर का फल है, जिसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, पशु आदिक मच्छर हैं। वासनारूपी रस से पूर्ण मज्जा पहाड़ है। पञ्चभूत सूत द्वारा उनका निकलने का खुला मार्ग इत्यादिक सुन्दर रचना बनी है।

उसमें त्रिलोकी का ईश्वर एक इन्द्र हुआ और गुरु के उपदेश से उसका आवरण नष्ट हो गया। फिर इन्द्र और दैत्यों का युद्ध होने लगा और इन्द्र अपनी सेना को ले चला। पर उसकी निर्बलता हुई, इसलिए वह भागा और दशों दिशाओं में घूमता रहा। पर जहाँ जावे, वहीं दैत्य उसके पीछे चले आवें। जैसे पापी परलोक में शोभा नहीं पाता, वैसे ही इन्द्र ने जब शान्ति न पाई, तब अणुमात्ररूप करके सूर्य के त्रसरेणु में प्रवेश कर गया। जैसे कमल में भृंग प्रवेश करे, वैसे ही उसने प्रवेश किया तो वहाँ उसको युद्ध का वृत्तान्त भूल गया। तब उसने एक मन्दिर में बैठा अपने को देखा। जैसे निद्रा से स्वप्न-सृष्टि प्रकट हो, वैसे ही उसने वहाँ रत्न और मणियों संयुक्त नगर देखा