योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हे विद्याधर ! जो वायु हुई तो जल से भिन्न कुछ न हुआ और जो न हुई तो भी जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही है। वैसे ही अज्ञान के होने और निवृत्त होने पर भी आत्मपद ज्यों का त्यों है । परन्तु सम्यक्दर्शन से आत्मपद और अज्ञान से जगत् भासित होता है। अहं का होना ही अज्ञान है। जब अहं हुआ तब मम भी होता है। सो 'अहं' 'मम' नाम संसार का है। जब अहं-मम मिटता है, तब जगत् का अभाव होता है। अहं के होने दृश्य भासित होता है और दृश्य में अहं होता है। इसमें संवेदन को त्यागकर निर्वाणपद में प्राप्त हो । इतना कह भुशुण्डिजी ने मुझसे कहा कि हे वशिष्ठजी ! इस प्रकार जब मैंने विद्या-धर को उपदेश किया तो वह समाधि में स्थित होकर निर्वाणपद को प्राप्त हुआ। जैसे दीपक बुझ जाता है, वैसे ही उसका चित्त क्षोभ से रहित शान्ति को प्राप्त हुआ। हे ब्राह्मण ! उसका हृदय शुद्ध था, इस कारण मेरे वचन शीघ्र ही उसके हृदय में प्रवेश कर गये । जब वह समाधि में स्थित हुआ तो मैंने उसको बारम्बार जगाया परन्तु वह न जागा—जैसे कोई जलता-जलता शीतल समुद्र में जाकर बैठे और उसमें कहिये कि तू निकल तो वह नहीं निकलता; वैसे ही संसारताप से जलता हुआ जीव जब आत्मसमुद्र में गोता लगाता है, तब वह संसार के अज्ञानरूपी प्रवाह को नहीं देखता। हे वशिष्ठजी ! जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़े वचन भी बहुत हो लगते हैं। जैसे तेल की एक बूँद जल में बहुत फैल जाती है, वैसे ही जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़ा वचन भी बहुत होकर लगता है। पर जिसका अन्तःकरण मलिन होता है, उस पर वचन प्रभाव नहीं डालते। जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही गुरुशास्त्र के वचन उसको नहीं लगते। जब विषयों से वैराग्य उपजे, तब जानिये कि हृदय शुद्ध हुआ।
हे वशिष्ठजी ! जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया, तब वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त हुआ; क्योंकि उसका चित्त निर्मल था। हे मुनीश्वर ! जो तुमने मुझसे पूछा था सो मैंने कहा कि उस