योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१६ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
चित्तकला अज्ञानरूप फुरी, उसको देह का सम्बन्ध हुआ है । उर्मी का नाम जीव है । वह जीव न सूक्ष्म है, न स्थूल है, न शून्य है, न अशून्य है, न थोडा है, न बहुत है, केवल शुद्ध आत्मतत्त्वमात्र है । वह न अणु है, न स्थूल है, अनन्त चैतन्य आकाशरूप है । उर्मी को जीव कहते हैं । स्थूल से स्थूल और सूक्ष्म से सूक्ष्म वही है । अनुभव चैतन्य सर्वगत जीव है । उसमें वास्तव शब्द कोई नहीं । और जो कोई शब्द है सो प्रतियोगी में मिलकर हुआ है । जीव अद्वैत है । उसका प्रतियोगी कैसे हो ? यह जीव का स्वरूप है । चेत्य के संयोग से जीव हुआ है । उसका अधिष्ठान चैतन्य आकाश, निर्विकल्प, चेत्य से रहित, शुद्ध, चैतन्य परमात्मतत्त्व है । उसमें जो संवित फुरी है, उर्मी का नाम जीव है । वह सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल और सबका बीज है । उर्मी को विराट् कहते हैं । उसका शरीर मनोमय है । वह आदि पर-मात्मतत्त्व से फुरा है और अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ, अर्थात् अस्वच्छता को नहीं प्राप्त हुआ । वह अपने को सबका आत्मा जानता है । इसका नाम विराट् है । उसका प्रथम शरीर मनोमात्र और शुद्ध प्रकाशरूप गगद्रूपरूपी मल से रहित अनन्त आत्मा है, वह मन, कर्मों और देहों का बीज है; सबमें व्याप्त रहा है और सब जीवों का अधिष्ठाता है । उर्मी ने संकल्प से ये जीव रचे हैं, और पञ्चज्ञान इन्द्रिय, अहंकार, मन और संकल्प, ये आठों आकार ग्रहण किये हैं । परमार्थ-रूप को छोड़ फुरने से जो आकार उत्पन्न हुए हैं, उनको ग्रहण करने का नाम पुर्यष्टका है । फिर इन इन्द्रियों के छिद्र रचे और स्थूल रूप रचकर उनमें आत्मा प्रतीत किया । जैसे जीव शयनकाल में जाग्रत् शरीर को त्यागकर स्वप्न-शरीर अङ्गीकार करता है, वैसे ही शुद्ध, चिन्मात्र, निर्विकल्प, अद्वैतस्वरूप को त्यागकर उसने वासनामय शरीर अङ्गीकार किया है । पर वास्तव स्वरूप का त्याग नहीं किया और स्वरूप से नहीं गिरा । शुद्ध निर्विकल्प भाव को त्यागकर विराट्-भाव ग्रहण किया है ।
इसी प्रकार आगे उस पुरुष ने ज्ञान से चारों वेद रचे और नीति को