योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
का स्थान भी जैसा-तैसा है, पर ज्ञान से सम्पन्न है तो उसको चक्रवर्ती जानो। यथा—
दो०—सात गाँठ कोपीन की, साध न मानै शङ्क।
राम अमल माता फिरै, गिनै इन्द्र को रङ्क॥
हे राम ! उसको चक्रवर्ती से भी अधिक जानो। यदि वह आरम्भ क्रिया करता भी दिखता है; पर संकल्प से रहित है तो कुछ नहीं करता। उसका करना, न करना दोनों बराबर हैं, क्योंकि वह निरभिमान है। वह शुभकर्मों के करने से स्वर्ग नहीं जाता और अशुभकर्म से नरक नहीं भोगता—उसको दोनों एक समान हैं।
हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी दोनों की चेष्टा समान है; परन्तु अज्ञानी अहंकारसहित करता है इससे दुःख पाता है। इससे तुम अहंकार का त्याग करो और अपना स्वरूप, जो चैत्य से रहित चैतन्य है, उसमें स्थित हो रहो, जिससे सब संशय मिट जावें। जितने जीव तुमको भासित होते हैं, वे सब संवित् अर्थात् ज्ञानरूप हैं, परन्तु बहिर्मुख फुरने के कारण भ्रम में पड़े हैं। जब जीव अन्तर्मुख हो तब केवल शान्तरूप हो। जहाँ गुणों और तत्त्वों का क्षोभ नहीं, वह शान्तपद कहलाता है। हे राम ! जैसे विराट्रूप का मन चन्द्रमा है, वैसे ही सब जीवों का है, अर्थात् सब विराट्रूप हैं, परन्तु प्रमाद से वास्तव स्वरूप नहीं भासित होता। हे राम ! जैसे गुलाब की सुगन्ध सम्पूर्ण वृक्ष में व्याप्त है, परन्तु फूल ही में भासित होती है, वैसे ही चैतन्य सत्ता सब शरीर में व्याप्त है, परन्तु हृदय में ही भासित होती है। जो त्रिकोणरूप निर्मलचक्र है, वहीं अहंब्रह्म का उत्थान होता है। वहाँ से वृत्ति फलकर पञ्चइन्द्रियों के छिद्र से निकलकर विषय को ग्रहण करती है और जीव उन इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में राग-द्वेष मानता है। इससे हे राम ! इतना कष्ट प्रमाद से है। जब बोध होता है, तब संसार का भ्रम मिट जाता है।
हे राम ! वासनारूप जो संसार है, उसका बीज अहंभाव है और वह प्रत्यक्ष संसार में दिखता है। जब इसकी चिन्तना न हो और स्वरूप