योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जब तुम अन्तर्मुख होगे, तब अहंकार निवृत्त हो जावेगा, विभुता को प्राप्त होगे; अहंप्रत्यय जाता रहेगा और परमानिर्वाण पद पाओगे । इससे संवेदन अहंकार का त्याग करो और कोई यत्न न करो । तुमको यही हमारा उपदेश है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सुखेनयोगोपदेशो नाम शताधिकत्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जो वासनारूपी संसार है; उससे तुम मङ्गी ऋषि के सदृश तर जाओ । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मङ्गी ऋषि किस प्रकार तरे हैं सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मङ्गीऋषि का वृत्तान्त सुनो । उसने महाउग्र तप किया था । एक समय मैं आकाश में अपने घर में था । तुम्हारे पितामह राजा अज ने मेरा आवाहन किया । तब मैं राजा अज के निमित्त आकाश से उतरा तो मार्ग में एक वन देखा जिसमें अनेक वन के समूह थे, जो भयानक और शून्य थे । वहाँ न कोई मनुष्य देख पड़ता था और न कोई पशु, केवल महाशून्य वन था—मानो एकान्त ब्रह्मस्थान हो—और कई योजन तक मरुस्थल ही देख पड़ता था । मध्याह्न का समय था और अतितीक्ष्ण धूप पड़ती थी, जाँघों तक तपी हुई रेत में मैंने प्रवेश किया और कई वृक्ष जले हुए वहाँ देख पड़े । हे राम ! उस शून्य स्थल में एक अतिदुःखित विदेशी आता मुझको देख पड़ा । उसने यह वाक्य मुख से निकला कि हाय हाय ! मैंने महाकष्ट पाया है । जैसे किसी को दुष्टजन दुःख देते हैं और दया नहीं करते, वैसे ही मुझको धूप और यात्रा ने जलाया है और मैं अतिदुःख को प्राप्त हुआ हूँ । हे राम ! ऐसे वचन कहता हुआ वह मेरे साथ चला जाता था । जब कुछ आगे गया तो एक धीवरों का गाँव देख पड़ा; जहाँ पाँच अथवा सात घर थे । उसको देखकर वह शीघ्र चलने लगा कि वहाँ मुझको शान्ति होगी और मैं जलपान करके छाया के नीचे बैठूँगा ।
हे राम ! उसको देखकर मुझे दया आई तो मैंने कहा कि हे मार्ग के मीत ! तू कहाँ जाता है ? जिनको सुखदायी जानकर तू दौड़ता है