योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२६ | योगवाशिष्ठ । |
|---|
विकार कोई नहीं रहता। जैसे कलियुग में शिखावाला तारा उदय होता है और कलियुग के अभाव में नहीं उदय होता वैसे ही ज्ञानवान् के चित्त में विकार उत्पन्न नहीं होता। हे रामजी! संसार भ्रम आत्मा के प्रमाद में उत्पन्न होता है; पर आत्मज्ञान होने से वह यत्न के बिना ही शान्त हो जाता है। फूल और पत्र के काटने में भी कुछ यत्न होता है परन्तु आत्मा के पाने में कुछ यत्न नहीं होता क्योंकि बोधरूप को बोध ही से जानता है। हे रामजी! जो जाननेमात्र ज्ञानस्वरूप है उसमें स्थिति होने का क्या यत्न है। आत्मा शुद्ध और अद्वैतरूप है और जगद्भ्रममात्र है। जिसकी सत्यता पूर्वापर विचार से न पाइये उसको भ्रममात्र जानिये और पूर्वापर विचार से जो स्थिर रहे उसको सत्यरूप जानिये। इस जगत् की सत्यता आदि अन्त में नहीं है। इससे स्वप्नवत् है। जैसे स्वप्न आदि अन्त में कुछ नहीं होता वैसे ही जाग्रत भी आदि अन्त में नहीं है इससे जाग्रत और स्वप्न दोनों तुल्य हैं। हे रामजी! यह वार्ता बालक भी जानता है कि जिसकी आदि अन्त में सत्यता न पाइये सो स्वप्नवत् है। जिसका आदि भी न हो और अन्त भी न रहे उसका मध्य भी असत्य जानिये। उसका दृष्टान्त यह है कि संकल्प पुरीवत्, ध्यान नगर की नाईं, स्वप्नपुरी की नाईं; वर और शाप से जो उपजता है उसकी नाईं और औषधि से उपज की नाईं, इन पदार्थों की सत्यता न आदि में होती है और न अन्त में होती है और मध्य में जो भासता है सो भी भ्रममात्र है वैसे ही यह जगत् अकारण है और कार्यकारणभाव सम्बन्ध से भासता है तो कार्य-कारण से कार्यरूप जगत् हुआ, पर आत्मसत्ता अकारण है। जगत् साकार और आत्मा निराकार है। इस जगत् का दृष्टान्त जो आत्मा में देंगे उसका तुमको एक अंश ग्रहण करना चाहिये। जैसे स्वप्न की सृष्टि का पूर्व अपर भाव आत्मा है, क्योंकि अकारण है और मध्यभाव का दृष्टान्त नहीं मिलता क्योंकि उपमेय अकारण है तो उसका इसके समान दृष्टान्त क्योंकर हो। इससे अपने बोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण करना। हे रामजी! जो विचारवान् पुरुष है सो गुरु और शास्त्र के वचन सुनके सुखबोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण