योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1242, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ४३५
पदार्थों की एकता भासित होती है; क्योंकि द्वैतसत्ता कोई नहीं है । जैसे स्पन्दन और निःस्पन्द, दोनों पवन ही है और जल और तरङ्ग अभेदरूप है, वैसे ही विश्व परमार्थस्वरूप है । इससे ऐसे निश्चय करो कि सब ब्रह्मस्वरूप है अथवा अपने को उठा दो कि मैं नहीं—जब तू न होगा, तब विश्व कहाँ से होगा ?
हे मङ्गीऋषि ! प्रथम जो अहं होता है तो पीछे ममत्व भी होता है, इसलिए जो अहं ही न रहेगा तो ममत्व कहाँ रहेगा ? इस अहं का होना ही बन्धन है और इसके अभाव का नाम मुक्ति है । हे मित्र ! इस युक्ति में क्या यत्न करना है ? यह तो अपने अधीन है कि सोचे मैं नहीं हूँ । जब अहंकार को निवृत्त किया, तब शेष वही रहेगा, जो सब का परमार्थरूप है । उसी को ब्रह्म कहते हैं । हे मुनीश्वर ! जब अहंकार उत्पन्न होता है, तब नाना प्रकार की वासना होती है, और उन वासनाओं के अनुसार जीव अनेक जन्म पाता है, जो वर्णन नहीं किये जा सकते । जैसे पवन से तृण उड़ते और भटकते फिरते हैं, वैसे ही वासना से जीव नाना योनियों में भटकते फिरते हैं । जब पर्वत से कंकड़ गिरता है, तब चोटें खाता नीचे को चला जाता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीव जन्म-जन्मान्तर पाते चले जाते हैं और वासनानुसार घटीयन्त्र की नाईं कभी ऊपर और कभी नीचे जाते हैं, जैसे हाथ से ताड़ना किया गेंद कभी ऊपर और कभी नीचे को जाता है । हे अङ्ग ! इस संसार का बीज वासना है । जब वासना निवृत्त हो तब सबकी एकता हो जाती है । जबतक संसार की वासना दृढ़ है, तब तक एकता नहीं होती । जैसे दूध और जल मिलता है तो उनका संयोग हो जाता है, वैसे ही आत्मा और विश्व का संयोग नहीं, आत्मा केवल अद्वैत और सबका अपना रूप है । जैसे मृत्तिका ही घटादिरूप भासित होती है, वैसे ही आत्मसत्ता ही जगतरूप होकर भासित होती है—इससे आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं ।
हे साधो ! आत्मा और दृश्य का काष्ठ और लाख का जैसा अथवा घट और आकाश का जैसा संयोग नहीं है, क्योंकि आत्मा अद्वैत है