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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1248, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1248

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४४१

अखण्डरूप है । यह जगत् उसी का चमत्कार है, जो उपज-उपजकर लय हो जाता है । हे राम ! ध्याता, ध्यान ध्येय की त्रिपुटी भ्रान्तिमात्र है । वास्तव में द्रष्टा, दर्शन, दृश्य सब आत्मस्वरूप हैं; इससे भिन्न कुछ नहीं । वह ब्रह्मस्वरूप आत्मा सदा एकरस है, कभी क्षोभ को नहीं प्राप्त होता । चाहे अमावस का चन्द्रमा दिखाई पड़ जाय और प्रलयकाल के बिना प्रलयकाल की वायु चले तो भी आत्मा को क्षोभ नहीं होता—आत्मपद सदा ज्यों का त्यों है । हे राम ! ऐसे आत्मा के प्रमाद से जीव दुःख पाते हैं । जब आत्मा को प्रमाद होता है, तब देह और इन्द्रियाँ अपने आपमें प्रत्यक्ष भासित होती हैं । पर जैसे बालू से तेल नहीं निकलता, आकाश में वन नहीं होता और चन्द्रमा के मण्डल में ताप नहीं होता, वैसे ही आत्मा में देह या इन्द्रियाँ कभी नहीं हैं ।

हे राम ! ये सब जीव आत्मरूप हैं, इससे इनको देह-इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं है; परन्तु इनको जो कर्मों में अभिमान होता है इसी से बन्धन में पड़ते हैं । हे राम ! जैसे नाव पर बैठे हुए पुरुष को भ्रान्ति से नदीतट के वृक्ष चलने लगते हैं, वैसे ही मन के भ्रम से आत्मा में चित्त और देह इन्द्रियाँ जान पड़ती हैं । वास्तव में चित्त, देह और इन्द्रियाँ कुछ भिन्न वस्तु नहीं । ये भी आत्मस्वरूप ही हैं । तब निषेध किसका कीजिये ? हे राम ! मन और इन्द्रियादिक को अपनी सत्ता कुछ नहीं, वह भ्रान्ति से भासित होती हैं । जैसे पर्वत पर उज्ज्वल मेघ होता है और उसमें वस्त्रबुद्धि निष्फल होती है, वैसे ही ये देहादिक हैं । इनमें अहंबुद्धि निष्फल है । इससे हे राम ! आत्मतत्त्व एक अखण्ड है, द्वैत कुछ नहीं । जब तुम ऐसे विचारोगे तो निरञ्जनरूप होगे । हे राम ! ये सब शरीर चित्त के स्फुरण से स्थित हैं । जैसे चित्त के स्फुरण से शरीर है, वैसे ही जीव में चित्त और परमात्मा में जीव हैं । हे राम ! इस प्रकार स्फुरण मात्र दृश्य हुआ तो द्वैत तो कुछ न हुआ । इस प्रकार विचार-पूर्वक दृश्यभ्रम को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो । हे राम ! ऐसी धारणा करके सुख से बिचरो और जो कुछ चेष्टा नीति से प्राप्त हो, उसको करो, परन्तु उसमें अपने कर्तृत्व का अभिमान न हो ।