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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1253, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1253

४४६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

रूप है। उसको ग्रहण करो। जो सबका अधिष्ठान है, उसको जब ग्रहण किया, तब सबको ग्रहण किया। हे राम! जो कुछ प्रपञ्च तुमको दिखता है, वह सब आत्मरूप है-उसी की भावना करो, जाग्रत् में सुषुप्त हो रहो और सुषुप्त में जाग्रत् रहो। संसार की सत्ता जाग्रत् है। उसकी ओर से सुषुप्त रहो; अर्थात् वासना से रहित होकर तुरीयपद में स्थित रहो, जहाँ गुणों का क्षोभ नहीं और निर्मल शान्तरूप है, जहाँ एक और दो की कलना नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो ऐसे शान्तरूप तुरीयपद में स्थित होना तुमने कहा, तो क्या तुममें यह भाव नहीं उठता कि मैं वशिष्ठ हूँ? उसका रूप क्या है जिससे अहं-प्रतीति तुमको नहीं होती?

इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज! जब इस प्रकार राम ने प्रश्न किया तब वशिष्ठजी चुप हो गये और सब सभा संशय के समुद्र में मग्न हो गई। तब राम बोले, हे भगवन्! चुप होना तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम साक्षात् विश्वगुरु और ब्रह्मवेत्ता हो। ऐसी कौन बात है जो तुमको न ज्ञात हो? क्या मुझको उसके जानने का अधिकारी नहीं देखते? जब ऐसे रामजी ने कहा, तब वशिष्ठजी एक घड़ी के उपरान्त बोले, हे राम! असामर्थ्य से मैं चुप नहीं हुआ। परन्तु जो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है, वही दिया। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर चुप्पी ही है। जो प्रश्न करनेवाला अज्ञानी हो तो उसको अज्ञान लेकर उत्तर देते हैं और जो ज्ञानवान् हो तो उसको ज्ञान से उत्तर देते हैं। पहले तुम अज्ञानी थे, तब मैं सविकल्प उत्तर देता था। अब तुम ज्ञानवान् हो। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मौन ही है। हे राम! जो कुछ कहना है, वह प्रतियोगी से मिला हुआ है। प्रतियोगी बिना शब्द के मैं कैसे कहूँ? पहले तुम सविकल्प शब्द के अधिकारी थे और अब तुमको निर्विकल्प का उपदेश किया है। हे राम! शब्द चार प्रकार के हैं-एक सूक्ष्म अर्थ का, दूसरा परमार्थ का, तीसरा अल्प और चौथा दीर्घ। तीन कलङ्क इनमें रहते हैं-एक संशय, दूसरा प्रतियोगी और तीसरा भेद। जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु रहते हैं, वैसे ही शब्द में कलङ्क रहते