योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1256, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ४४६
अजर और अमर परमात्मतत्त्व में खाते-पीते, चलते-फिरते वृत्ति रहेगी ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भावनाप्रतिपादनोपदेशो नाम शताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार पुरुष आत्मपद को प्राप्त होता है सो सुनो ! जब निरहंकार होता है, तब आत्मपद को प्राप्त होता है । जो सर्वात्मा है, उसका आवरण करनेवाली अविद्या ही है । जैसे सूर्य-मण्डल को बादल ढक लेता है, वैसे ही अविद्या आत्मा का आवरण करती है । उस अविद्या से मूर्ख उन्मत्त की तरह चेष्टा करते हैं, और जो अहंता से रहित ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको कोई दुःख नहीं स्पर्श करता—वह सदेह भी दुःख शून्य होता है । जैसे भीत पर लिखी युद्ध की सेना देखने भर को क्षुब्ध दिखती है; परन्तु शान्तरूप होती है, वैसे ही ज्ञान-वान् की चेष्टा में भी क्षोभ दिखता है, परन्तु वह सदा अक्षोभ और निर्वाणरूप है । वह वासनासहित देख पड़ता है, पर सदा निर्वा-सनिक है । जैसे जल में लहर और चक्कर के क्षोभ दिखते हैं, परन्तु वे जल से भिन्न नहीं होते, वैसे ही ज्ञानवान् को ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । जिसके हृदय से दृश्यभाव शान्त हो गया है, पर बाहर से क्षोभ दिखता है, तो भी वह मुक्तरूप है । जैसे बादल आकाश में हाथी, घोड़ा और पहाड़ के रूप में दिखते हैं, परन्तु हैं कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् दिखता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं है । अहंकार से भासित होता है और अहंकार से रहित होने पर निर्विकार शान्तरूप हो जाता है । ऐसा जो निरहंकार आत्मपद है, उसको पाकर ज्ञानवान् शोभित होता है । शरत्काल का आकाश, क्षारसमुद्र और पूर्णमासी का चन्द्रमा भी ऐसा नहीं शोभा पाता, जैसा ज्ञानवान् पुरुष शोभा पाता है । हे राम ! अहन्ता ही इस पुरुष का मैल है । जब अहन्ता नष्ट हो, तब स्वरूप की प्राप्ति हो और संसार के पदार्थों की भावना निवृत्त हो; क्योंकि वह भ्रम से उपजी थी । जो वस्तु भ्रम से उपजी होती है, उसका भ्रम का अभाव होने पर अभाव हो जाता है । जैसे आकाश में धुएँ का बादल नाना प्रकार के आकार में दिखता है पर वे आकार हैं नहीं,