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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1260, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1260

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४५३

ही रूप भासित होता है । जैसे स्वप्न में अपना रूप ही द्वैतरूप होकर दिखता है और रागद्वेष उपजता है, पर जब जागता है तब सब आत्म-रूप भासित होता है, वैसे ही यह जगत् है । इस जगत् का निमित्त कारण और उपादान कारण कोई नहीं है। जो पदार्थ कारण बिना भासित हो, उसे असत् जानिये । वह वास्तव में उपजा नहीं, भ्रम से सिद्ध है । जैसे स्वप्नसृष्टि अकारण है, वैसे ही जगत् अकारण है और भ्रम से भासित होता है । हे राम ! शास्त्र की युक्ति से विचार करके देखो तो द्वैतभ्रम मिट जाय । रज्जुभर भी कुछ बना नहीं । जैसे आकाश में नीलापन नहीं है और मरुस्थल में नदी नहीं है, वैसे ही इस जगत् को भी जानो । आत्मा शुद्ध और अद्वैत है । उसमें अहं का उठना ही दुःख और सभी दुःखों का कारण है । जो स्वरूप का प्रमाद न हो तो अहं भी दुःख का कारण नहीं होता, और जो स्वरूप भूला तो विष की बेलि अहंकारादिक दृश्य बढ़ते जाते हैं और नाना प्रकार के आकार धारण करते हैं । तब वासना दृढ़ होती है । जब तक वासना होती है तब तक बन्धन है । जब वासना निवृत्त हो, तभी कल्याण होता है ।

हे राम ! जीव जिस दृश्य की भावना करता है, वही देख पाता है । जैसे समुद्र में तरङ्ग और चक्र जो होते हैं, वे समुद्र से भिन्न नहीं होते, वैसे ही अहंकार आदिक जो दृश्य हैं, वे हैं नहीं । और जब हैं नहीं तो उनकी इच्छा करना मूर्खता है । ज्ञानवान् की वासना क्षीण हो जाती है और उसके बन्धन का कारण नहीं होती, क्योंकि संसार की सत्यता उसके हृदय में नहीं रहती । क्योंकि आत्मा का साक्षात्कार उसे हो जाता है । जब आत्मा का प्रमाद होता है, तब अहन्ता उदय होती है और दृश्य भासित होता है । जैसे नेत्र के खोलने से दृश्य का ग्रहण होता है और नेत्र मूँद लेने पर दृश्यरूप का अभाव हो जाता है, वैसे ही जब अहन्ता उदय होती है तब दृश्य भी होता है और जब अहन्ता नष्ट होती है, तब संसार का अभाव हो जाता है । हे राम! अहन्ता का उदय होना ही अज्ञान है और अहन्ता से ही बन्धन है । अहन्ता से रहित होना मोक्ष है—आगे जो इच्छा तुम्हारी हो, सो करो ।