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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1272, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1272

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ४६५

ही न लगे तो इच्छा कैसे हो ? हे राम ! इच्छा ही बन्धन है, और इच्छा से रहित होने का नाम मुक्ति है। इससे ज्ञानवान् को कुछ इच्छा नहीं रहती। उसकी चेष्टा अनिच्छित ही होती है। जैसे सूखे बाँस के भीतर बाहर शून्य होता है, और उसको संवेदन कुछ नहीं फुरता, वैसे ही ज्ञानवान् के अन्तस में शान्ति होती है। अन्तस में कोई संकल्प नहीं उठता और बाहर भी कोई उपाधि नहीं। उसकी चेष्टा निःसंकल्प, निरुपाधि होती है। हे राम ! जिस पुरुष के हृदय से संसार का रस सूख गया है, वह संसार समुद्र के पार हो गया। जिसका रस नहीं सूखा, उसको राग-द्वेष फुरते हैं। उसे संसार-बन्धन में पड़ा जानो।

हे राम ! मैं तुमसे ऐसी समाधि कहता हूँ, जो सुख से प्राप्त हो और जिससे जीव मुक्त हो। सब इच्छाओं से रहित होना ही परमसमाधि है। जिस पुरुष के मन में इच्छा उठती है, उसको उपदेश भी नहीं लगता। जैसे आरसी के ऊपर मोती नहीं ठहरता, वैसे ही उसके हृदय में उपदेश नहीं ठहरता। इच्छा ही जीव को दीन करती है। इच्छा से रहित मनुष्य शान्तरूप होता है। फिर शान्ति के लिए कुछ कर्तव्य नहीं रहता। हे राम ! हम तो इच्छा-रहित हैं, इससे हमारे भीतर-बाहर शान्ति है और हमारे लिए करने योग्य कर्तव्य कुछ नहीं। यह सब चेष्टा प्रारब्ध के अनुसार और राग-द्वेष से रहित होती है। हम बोलते हैं, परन्तु बाँसुरी की तरह जैसे बाँसुरी अहंकार से रहित बोलती है, वैसे ही ज्ञानवान् अहंकार से रहित हैं और स्वाद को ग्रहण करते हैं। जैसे कलछी सब व्यञ्जनों में डाली जाती है और उसी के द्वारा सब व्यञ्जन निकलते हैं, परन्तु उनको उनसे कुछ रागद्वेष नहीं होता। वैसे ही ज्ञानवान् स्वाद लेता है। जैसे पवन भली-बुरी गन्ध को लेता है, परन्तु उसमें राग-द्वेष से रहित है, वैसे ही ज्ञानवान् राग-द्वेष के संवेदन से रहित रहकर गन्ध को लेता है। और इसी प्रकार सब इन्द्रियों की चेष्टा करता है, परन्तु इच्छा से रहित होता है। इसी से परमसुखरूप है। जिसकी चेष्टा इच्छासहित है, वह परमदुःखी है। हे राम ! जिस पुरुष को भोग रस नहीं देते, वही सुखी है, और जिसको रस देते हैं, जिसकी राग से तृष्णा बढ़ती जाती