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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1274, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1274

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४६७

उपाय करता है । हे राम ! इच्छारूपी क्षेत्र में रागद्वेषरूपी विष की बेलि है । जो पुरुष उसे दूर करने का उपाय नहीं करता, वह मनुष्य नहीं, पशु है । यह इच्छारूपी विष का वृक्ष बढ़कर नाश का कारण होता है । इससे तुम इसका नाश करो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छानिषेधयोगोपदेशो नाम शताधिकषट्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इच्छारूपी विष के नाश का उपाय तुमसे पहले भी कहा है, और अब फिर स्पष्ट करके कहता हूँ । यह संसार इच्छा के त्याग करने के योग्य है । यदि इसे आत्मसत्ता से भिन्न कीजिये तो यह मिथ्या है, उसमें क्या इच्छा करना है ? और जो आत्मा की ओर देखिए तो सब आत्मा ही है । तब क्यों इच्छा करना ? इच्छा दूसरे में होती है, पर वास्तव में दूसरा तो कुछ है ही नहीं, तो इच्छा किसकी कीजिए ? हे राम ! द्रष्टा और दृश्य भी मिथ्या है । द्रष्टा इन्द्रियाँ और दृश्य विषय, ग्राहक इन्द्रियाँ और ग्राह्य विषय अविचार सिद्ध हैं, भ्रम से भासित होते हैं । आत्मा में कोई नहीं । जैसे स्वप्न में भ्रम से रूप दिखते हैं, वैसे ही ये ग्राह्य-ग्राहक भ्रम से भासित होते हैं । सुख-दुःख भी इन्हीं से होते हैं, आत्मा में यह कुछ नहीं है । हे राम ! द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तीनों ब्रह्म में कल्पित हैं । वास्तव में सब ब्रह्म ही है । चिरकाल से हम खोज रहे हैं, परन्तु द्वैत हमको नजर नहीं आता; एक ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों भासित होती है, जो निराभास फुरने से रहित और ज्ञानरूप है । वह आकाश से भी सूक्ष्म है, और सब जगत् भी वही है—वही मैं हूँ । हे राम ! जैसे जल में तरङ्ग, आकाश में शून्यता, पवन में स्पन्दन और अग्नि में उष्णता सब वही अनन्यरूप है, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है । आत्मा ही विश्व आकार होकर भासित होता है, और कुछ नहीं हुआ । हे राम ! जो वही है, तब इच्छा किसकी करते हो । जब मैं तुमसे यह मोक्ष का उपाय कहता हूँ, तब तुम अपने को क्यों बन्धन में डालते हो ? बड़ा बन्धन इच्छा ही है । जिस पुरुष की इच्छा बढ़ती जाती है, वह जगत्-