योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १३० | योगवाशिष्ठ । |
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दिक गुण स्थित होते हैं। जैसे बड़े ताल से मेघ और मेघ से ताल पुष्ट होता है वैसे ही शमादिक गुणों से आत्मज्ञान होता है और आत्मज्ञान से शमादि गुण पुष्ट होते हैं। ऐसा विचार करके शम सन्तोषादिक गुणों का अभ्यास करो तब शीघ्र ही आत्मतत्त्व को प्राप्त होगे। हे रामजी! ज्ञानवान पुरुष को शमादिक गुण स्वाभाविक प्राप्त होते हैं और जिज्ञासुको अभ्यास करने से प्राप्त होते हैं। जैसे धान्य की रक्षा जब स्त्री करती है और ऊँचे शब्द से पक्षियों को उड़ाती है तब फल को पाती है और उससे पुष्ट होती है वैसे ही शम सन्तोषादिक के पालने से आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है। हे रामजी! इस मोक्ष उपाय शास्त्र को आदि से लेकर अन्त पर्यन्त विचारे तो भ्रान्ति निवृत्ति होके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सर्व पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। यह शास्त्र मोक्ष उपाय का परम कारण है। जो शुद्ध बुद्धिमान् पुरुष इसको विचारेगा उसको शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी। इससे इस मोक्ष उपाय शास्त्र का भले प्रकार अभ्यास करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे आत्माप्तिवर्णनन्नामैकोन-विंशतितमस्सर्गः ॥ १९ ॥
समाप्तमिदं मुमुक्षुप्रकरणं द्वितीयम् ॥