योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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आकाश के आश्रय से बढ़ता है और वैराग्यरूपी रस और सन्तोषरूपी फल से पुष्ट होता है। जो पुरुष इसका आश्रय लेगा, वह शान्ति पावेगा।
हे राम ! जबतक मनरूपी मृग इस समाधानरूपी वृक्ष का आश्रय नहीं लेता, तब तक भटकता फिरता है, शान्ति नहीं पाता । जैसे मृग वन में भटकता है, वैसे ही मनमृग भटकता है । द्वैत, अज्ञान और प्रमादरूपी वधिक उसे मारने लगते हैं, इससे दुःख पाता है । जब भय से इन्द्रियरूपी गाँववासियों के निकट जाता है, तब वे आप ही इसको देखकर पकड़ लेते हैं अर्थात् विषयों की ओर खींचते हैं और उससे यह बड़ा कष्ट पाता है । इनके भय से जब फिर वन में जाता है तो वहाँ विषयों के न मिलने की तपन से दुःखी होता है । जब उसको भी त्यागकर रसरूपी स्थानों को शान्ति के निमित्त दौड़ता है, तब काम-रूपी कुत्ता काटने को दौड़ता है और उसके भय से जब फिर वैराग्य-रूपी वन की ओर दौड़ता है तब क्रोधरूपी अग्नि जलाती है; वासना-रूपी मच्छड़ दुःख देते हैं । लोभ और मोहरूपी अँधेरी इसे अन्धा बना देती है । निदान पुत्र और धनरूपी हरे-हरे तृणों को देखकर यह उनको ग्रहण करता है, तब गढ़े में गिर पड़ता है । वह गढ़ा तृण से ढका हुआ है । वह तृण पुत्र और धन है । उनको सुन्दर देख यह ममतारूपी गढ़े में गिर पड़ता है । इस प्रकार दुःख पाता है । हे राम ! जब यह मनुष्य झूठ बोलता है, तब मृत्तिका में लोटने की सी चेष्टा करता है और जब मनरूपी भेड़िया आता है, तब वह उसको भक्षण कर जाता है । जब समाधानरूपी वृक्ष से जीव विमुख होता है, तब इतने कष्ट पाता है । और जब मनरूपी भेडिये से छूटता है, तब आशा रूपी जञ्जीर में बँध जाता है । निदान जब तक इस वृक्ष के निकट नहीं आता है; तब-तक बड़े कष्टदायक स्थानों को जाता है । तमाल वृक्षादिक के तले भी जाता है और कण्टक के वृक्षों के तले भी जाता है, परन्तु शान्ति किसी स्थान में नहीं पाता—बड़े-बड़े कष्टों को ही पाता है ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हरिणोपाख्याने वृत्तान्तयोगो-पदेशो नाम शताधिकचतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ १६४ ॥