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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1308, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1308

५०२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

को प्राप्त होता है, जो आदि और अन्त में रहित है। उसकी प्राप्ति का उपाय यह है कि वेदान्त का अध्ययन करे और प्रणव का जप करे। जब इनसे थके, तब समाधिस्थ हो और जब फिर थके, तब वहीं पूर्व-स्थित में आकर मनन करे। जब ऐसे दृढ़ अभ्यास हो तब उस पद को प्राप्त होगा, जो संसार का पार है। जब उस पद को पाया, तब परम-शान्ति को प्राप्त होगा और स्वच्छ निर्मल अपने स्वभाव में स्थित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वभावसत्तायोगोपदेशो नाम शताधिकषट्षष्टितमसर्गः ॥ १६६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार बड़ा गम्भीर है। इसका तरना कठिन है। जिसको इससे तरने की इच्छा हो, उसका यह कर्तव्य है कि वेदान्त का अध्ययन, प्रणव का जप और चित्त को स्थिर करे। जब ऐसा उपाय करे, तब ईश्वर उस पर प्रसन्न होंगे और उसके हृदय में विवेक उत्पन्न होगा; जिससे संसार असत्य प्रतीत होगा और सन्त जनों का संग प्राप्त होगा। संत जनों का आचार शुभ है। वे परमशान्त, गम्भीर और ऊँचे अनुभवरूपी फल से युक्त वृक्ष हैं। उनके यश, कीर्ति और शुभ आचार फूल और पत्ते हैं। ऐसे सन्तजनों की संगति जब प्राप्त होती है, तब जगत् के रागद्वेषरूपी तम मिट जाते हैं। जैसे किसी मजूर के शिर पर बोझ हो और वह तपन से दुखी हो, पर वृक्ष की शीतल छाया प्राप्त होने पर वह शीतल होता है, फल खाकर तृप्त होता है, और थकान का कष्ट दूर हो जाता है, वैसे ही सन्तों के संग से मनुष्य सुख को प्राप्त होता है। जैसे चन्द्रमा की किरणों से मनुष्य शीतल होता है, वैसे ही सन्तजनों के वचन से शान्ति होती है। हे राम! सन्तजनों की संगति करने से पाप दग्ध हो जाते हैं। जो पुरुष सकाम होकर तप, यज्ञ और व्रत करते हैं, उनकी संगति न कीजिये; क्योंकि वे ऐसे हैं, जैसे यज्ञ का खम्भा पवित्र होता है, परन्तु उसकी छाया कुछ नहीं, इससे उसके नीचे कोई सुख नहीं पाता। हे राम! सब सकाम कर्म जन्म-मरण देने-वाले हैं। यद्यपि जिज्ञासु भी यज्ञ, व्रत और तप करते हैं, तो भी वे उनमें