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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1310, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1310

५०४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

करता है। हे राम! भोगरूपी बड़ा विष है। उसका दिन-दिन त्याग करना विशेष लाभदायक है। जीव जब तृष्णा का त्याग करता है, तब अति शोभा पाता है। जैसे राहु दैत्य से रहित चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तृष्णा का वियोग होने पर पुरुष शोभा पाता है। हे राम! जब भोगों से वैराग्य होता है, तब दो पदार्थों की प्राप्ति होती है। जैसे नूतन अंकुर के दो पत्ते होते हैं, वैसे ही तृष्णा के त्याग से एक तो सन्तों की संगति मिलती है और दूसरे सत्शास्त्र का विचार उत्पन्न होता है। इनमें जब दृढ़ भावना होती है, तब अभ्यास करके वही परमानन्दरूप होता है, जिसमें वाणी की संगति नहीं। तब मनुष्य भोगों की इच्छा से मुक्त होता है, और परमशान्ति सुख पाता है। जैसे पिंजड़े से निकलकर पक्षी सुखी होता है, वैसे ही वह सुखी होता है।

हे राम! जीव को भोग की इच्छा ने ही दीन किया है। जब इच्छा निवृत्त होती है, तब गोपद की तरह वह संसारसमुद्र को लाँघ जाता है, तब उसको तीनों जगत् सूखे तृण जैसे तुच्छ लगते हैं। हे राम! जब वह भोग की इच्छा से मुक्त होता है, तब ईश्वर होता है। जिस पुरुष को आत्मसुख प्राप्त हुआ है, वह भोगों की इच्छा कभी नहीं करता और जब वे आकर प्राप्त होते हैं, तब भी वे उसको नीरस और मिथ्या प्रतीत होते हैं, इससे वह उनके भोग को नहीं चाहता। जैसे जाल से निकला हुआ पक्षी फिर जाल में नहीं पड़ता, वैसे ही वह पुरुष भोगों को नहीं चाहता। जब विषयों की तृष्णा निवृत्त होती है, तब परम शान्ति पाता है और सन्तों के वचन उसके हृदय में शीघ्र ही प्रवेश करते हैं।

हे राम! मोक्षरूपी स्त्री के कानों के भूषण सन्तों की संगति है। जब साधु की संगति होती है, तब अशुभ कर्मों का त्याग हो जाता है और पराये धन की इच्छा नहीं रहती। तब जो कुछ अपना होता है, उसके भी त्यागने की इच्छा होती है और भले भोग जो भोगने के लिए आते हैं, उनको वह बाँटकर भोग करता है। निदान बड़े उत्तम भोगों से लेकर साग तक जो कुछ प्राप्त है, उसमें से औरों को