योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1322, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५१६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
राम ! जैसे गूलर में मच्छर होते हैं, वैसे ही ये जीव भी भ्रम में फुरते हैं। यह जाग्रत् सृष्टि कहा। और स्वप्न में जो जाग्रत् है, उसका नाम स्वप्न-जाग्रत् है। पुरुष बैठा हो और चित्त की वृत्ति ठहर जाय, पर निद्रा नहीं आई। उसमें मनोराज्य हुआ और उस मनोराज्य में जगत होकर उसी में दृढ़ वासना हो गई और पूर्व की वासना भूल गई। यह मत भाषित हुई और उसमें मनोराज्य का शरीर भाषित हुआ। वही आधि-भौतिकता दृढ़ हो गई। उसका नाम संकल्प-जाग्रत् है। आदि-परमात्मतत्त्व में जो प्रकट हुआ और आत्मा में जो जगत भाषित हुआ, उसको संकल्पमात्र जाना। उसका नाम केवल जाग्रत् है। आदि परमात्मतत्त्व से क्षोभ हुआ; उसमें सृष्टि हुई और उसको मत जानकर ग्रहण किया। स्वरूप का प्रमाद हुआ और आगे जन्मान्तर की प्राप्त हुआ। उसका नाम चिरजाग्रत् है। जब इसमें दृढ़ घनीभूत वासना हुई और जीव पापकर्म करने लगा, उसके कारण स्थावर योनि पाई, तो उसका नाम घनजाग्रत् और सुषुप्तजाग्रत् है। जब इसमें सन्तों की संगति और मनशास्त्रों के विचार से बोध प्राप्त हुआ, तब यह जाग्रत्सृष्टि उसको स्वप्न हो जाती है। उसका नाम स्वप्नजाग्रत् है। जब बोध में दृढ़ स्थिति हुई, तब उसको तुरीयपद कहते हैं—उसका नाम क्षीणजाग्रत् है। जब जीव इस पद को प्राप्त होता है, तब परमानन्द की प्राप्ति होती है।
हे राम ! ये सात प्रकार के जीव और सृष्टि मैंने तुमसे कहे। इनको विचार करके देखोगे तो तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जायगा। यह भी क्या बताना है कि यह जीव है और यह सृष्टि है ? सब ब्रह्मसत्ता है, दूसरा कुछ हुआ नहीं। मन के स्फुरण से दृश्य भाषित होता है। मन को स्थिर करके देखोगे तो सब शून्य हो जावेगा, और शून्य भी न कहकर शून्य का कहना भी न रहेगा—इस गिनती को भी विस्मरण करोगे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सप्तप्रकारजीवसृष्टिवर्णनं नाम शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७० ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो केवल जाग्रत् की उत्पत्ति अकारण, अकर्म और बोधमात्र में कही, सो असम्भव है—जैसे आकाश