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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1325, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1325

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५१६

जैसे वर्षाकाल में मेघ घने होते हैं और जब शरत्काल आता है तब अदृश्य हो जाते हैं, वैसे ही जब बोधरूपी शरत्काल आता है, तब अनात्म में आत्म-अभिमानरूपी मेघ नष्ट हो जाता है और परम स्वच्छता प्रकट होती है । हे राम ! जितना जगत् पिण्डरूप होकर भासित होता है, जब आत्मा का साक्षात्कार होगा, तब उसमें पिण्ड-बुद्धि जाती रहेगी और सब जगत् आकाशरूप हो जायगा । जैसे शरत्-काल में मेघों की बहुलता जाती रहती है और सब आकाशरूप हो जाता है । हे राम ! यह भ्रान्ति तब तक है, जब तक जीव स्वरूप में सुषुप्ति मा है । जब जागेगा तब सब जगत् आकाश सा शून्य हो जायगा, जैसे स्वप्न में जागने पर स्वप्नजगत् आकाशरूप हो जाता है । हे राम ! यह विकार, क्षोभ और नानात्व प्रमाद से दिखते हैं । जब आत्मबोध होता है, तब सब क्षोभ और विकार मिट जाते हैं । सब प्रपञ्च एक हो जाने से द्वैतभाव मिट जाता है । जैसे प्रज्वलित अग्नि में घृत, ईंधन या मिष्ठान्न जो कुछ डालिये, वह एकरूप हो जाता है, वैसे ही जब बोध होता है, तब सब जगत् एकरूप हो जाता है । जैसे नाना प्रकार के भूषण अग्नि में डालिये तो सब सुवर्ण ही हो जाता है और भूषण की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही मन को जब आत्मबोध में डाल दिया, तब जगत्संज्ञा नहीं रहती, केवल परमात्मतत्त्व हो जाता है ।

हे राम ! इन्द्रियाँ और जगत् तब तक हैं, जब तक जीव स्वरूप में अनजान सोया पड़ा है । जब जागेगा, तब संसार की सत्यता मिट जायगी और इच्छा भी कोई न रहेगी । जैसे किसी पुरुष को स्वप्न आता है, और जब उस स्वप्न से वह जागता है, तब स्वप्न के स्मरण की इच्छा नहीं करता कि वह मुझको याद आवे या उसमें मिले हुए सुख-दुःख या मनुष्य मुझे मिलें; क्योंकि उसको सत्यता नहीं जान पड़ती तो इच्छा कैसे करे, वैसे ही जब तक जीव स्वरूप में अनजान सोया पड़ा है, तब तक संसार के पदार्थों को मिथ्या नहीं जानता, उनकी इच्छा करता है । जब तुम स्वरूप ज्ञान में जागोगे, तब सब पदार्थ नीरस हो जावेंगे और जब ज्ञान से जगत् को मिथ्या स्वप्नवत्