योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1333, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५२७
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जगत् का भाव-अभाव, जड़-चैतन्य, स्थावर-जङ्गम, सूक्ष्म-स्थूल, शुभ-अशुभ कुछ हुआ नहीं तो मैं तुमसे क्या कहूँ, कि यह कार्य है और इसका यह कारण है? यह हुआ ही नहीं तो फिर कारण-कार्य कैसे हो? जो सब देश, सब काल और सब वस्तु हो वह कारण-कार्य कैसे हो? आत्मा केवल अपने आपमें स्थित है और जो है और नहीं की नाईं स्थित हुआ है, उसमें संवेदन है और उसके फुरने से जगत् भासता है। वह फुरना चैतन्यमात्र का विवर्त है और उस विवर्त्त से जगद्भ्रम हुआ है। जब वही फुरना उलटकर अपनी ओर आता है, तब जगत् भ्रम मिट जाता है और जब फुरता है तब ध्यान, ध्याता और ध्येयरूप होकर स्थित होता है। इसी का नाम जगत् है, और इसी में बन्धन और मुक्ति है। आत्मा में न बन्धन और न मोक्ष है। हे राम ! जब तरङ्ग घन होकर बहता है, तब एक नदी होकर चलता है, वैसे ही जब वासना दृढ़ होती है, तब जगतरूप होकर स्थित होता और भासित होता है। जब ऐसी वासना दृढ़ हुई, तब रागद्वेष संकल्प में बन्धनवान् होता है और जब वासना क्षय होती है तब जगत् का अभाव होकर स्वच्छ आत्मा दिखता है। जैसे शरत्काल का आकाश स्वच्छ होता है-उससे भी निर्मल दिखता है। हे राम! जीव जो निकल जाता है सो मरता नहीं। मुआ तब कहा जाय, जब अत्यन्त अभाव को प्राप्त हो और न जाना जाय। इसमें यह मरना नहीं, क्योंकि फिर जगत् भासता है। यह मरना सुषुप्ति की नाईं हुआ-जैसे सुषुप्ति से जागने पर जगत् भासता है और वही चेष्टा करने लगता है और जैसे स्वप्न और जाग्रत् होता है, वैसे ही मृत्यु और जन्म भी है।
यदि मरने का शोक उपजे तो जीने का सुख भी मानिये और जो जीने का हर्ष उपजे तो उसमें मरने का शोक मानिये-दोनों अवस्था शरीर की सम रची हैं। जब यह अवस्था शरीर की जानोगे तब तुम्हारा हृदय शीतल हो जायगा। जब संवेदन फुरने का अत्यन्त अभाव हो, तब परम शान्ति होती है। ध्यान, ध्याता और ध्येय तीनों