योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1349, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ५१३
ब्रह्म मे फिर कैसे सृष्टि उत्पन्न होती है सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठ- जी बोले, हे राम ! जब महाप्रलय होता है, तब सब भूत नष्ट हो जाते हैं, और ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है। उसको तुम मानते हो; क्योंकि तुमने भी कहा कि पीछे ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है। जब तुमने माना कि सबका कारण ब्रह्म ही शेष रहता है, तब सोचो, वह ब्रह्मसत्ता शुद्ध- स्वरूप और आकाश मे भी सूक्ष्म है; वरन् आकाश के हजारवें भाग से भी अतिसूक्ष्म है। हे राम ! ऐसे सूक्ष्म ब्रह्म मे जगत् की उत्पत्ति कैसे कहूँ ? और जब उत्पत्ति ही नहीं तो उसका प्रलय कैसे हो ? यह जगत् जो दिखता है, वह ब्रह्म का हृदय है। अपनी स्वभावसत्ता का नाम हृदय है। जैसे स्वप्न में अपनी संवित् ही देश, काल, पर्वत आदिकरूप रखती है; वैसे ही यह जगत् संवितरूप है और अपने स्वरूप के अज्ञान मे हुए की नाईं दुःखदायक भासता है। जैसे अपनी परछाहीं में अज्ञान से भूत की कल्पना करके बालक भय पाता है, पर जब विचार मे देखता है, तब भय निवृत्त हो जाता है, वैसे ही यह जगत् उपजा नहीं। हे राम ! चैतन्य-संवित् ही जगत् के आकार में भासने होती है, और कुछ वस्तु नहीं। जब सब वही हुआ, तब आदिसर्ग और प्रलय, सब उसी के अंग हैं, भिन्न नहीं। 'अस्ति', 'नास्ति', 'उदय', 'अस्त' आदि सब शब्द आकाशरूप हैं और सबका अधिष्ठान आत्मसत्ता है। सब शब्द ब्रह्म ही में होते हैं, और ब्रह्म सब शब्दों से रहित भी है। जो वह शब्दों से रहित हुआ तो जगत् की उत्पत्ति और प्रलय क्योंकर कहा जाय ? आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य और अदृश्य है, इन्द्रियों का विषय नहीं है। जगत् भी अविनाशी है; क्योंकि उपजा ही नहीं। हे राम ! जगत् भी आत्मा मे भिन्न नहीं—आत्मरूप ही है और जब आत्मरूप है तो विकार कहाँ हो ? सब शब्द और अर्थ का अधिष्ठान आत्मसत्ता है। इससे जगत् ब्रह्मस्वरूप है। जैसे अंगवाला सब अंग अपने ही जानता है, वैसे ही सब जगत् ब्रह्म के अंग हैं और वह सबको जानता है। वास्तव में आकाशवत स्वच्छ, और देश, काल, वस्तु, सुख, दुःख, जन्म, मरण, साकार, निराकार, केवल, अकेवल, नाशी, अविनाशी