भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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उत्पत्ति प्रकरण । १३७

किसी कारण से नहीं हुआ, स्वतः स्वाभाविक ही ऐसा उल्लेख आय फुरा है उसी का नाम स्वयंभू ब्रह्मा है । उस ब्रह्म को सदा ब्रह्मा ही का निश्चय है । ब्रह्मा और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं है । जैसे समुद्र और तरङ्ग में आकाश और शून्यता में और फूल और सुगंध में कुछ भेद नहीं होता वैसे ही ब्रह्मा और ब्रह्म में भेद नहीं । जैसे जल द्रवता के कारण तरङ्गरूप होकर भासता है वैसे ही आत्मसत्ता चैतन्या मे ब्रह्मा होकर भासती है । ब्रह्मा दूसरी वस्तु नहीं, सदा चैतन्य आकाश है और पृथ्वी आदिक तत्त्वों से रहित है । हे रामजी ! न कोई इसका कारण है और न कोई कर्म है । रामजी बोले, हे भगवन् ! आपने कहा कि ब्रह्माजी का वपु पृथ्वी आदि तत्त्वों से रहित है और सङ्कल्पमात्र है तो इसका कारण स्मृतिरूप संस्कार क्यों न हुआ । जैसे हमको और जीवों की स्मृति है वैसे ही ब्रह्मा को भी होनी चाहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! स्मृति संस्कार उसी का कारण होता है जो आगे भी देखा हो । जो पदार्थ आगे देखा होता है उसकी स्मृति संस्कार से होती है और जो देखा नहीं होता उसकी स्मृति नहीं होती । ब्रह्माजी अद्वैत, अज और आदि, मध्य, अन्त से रहित हैं, उनकी स्मृति कारण कैसे हो ? वह शुद्ध बोधरूप है और आत्मतत्त्व ही ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है । अपने आपसे जो इसका होना हुआ है इसी से इसका नाम स्वयंभू है । शुद्ध बोध में चैत्य का उल्लेख हुआ है—अर्थात चित्र चैतन्यस्वरूप का नाम है । अपना चित् संवित् ही कारण है और दूसरा कोई कारण नहीं—सदा निराकार और सङ्कल्परूप इसका शरीर है और पृथ्वी आदिक भूतों से शुद्ध अन्तवाहक वपु है । रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! जितने जीव हैं उनके दो दो शरीर हैं—एक अन्तवाहक और दूसरा आधि-भौतिक । ब्रह्मा का एक ही अन्तवाहक शरीर कैसे है यह वार्ता स्पष्ट कर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो सकारणरूप जीव हैं उनके दो दो शरीर हैं पर ब्रह्माजी अकारण हैं इस कारण उनका एक अन्त-वाहक ही शरीर है । हे रामजी ! सुनिये, अन्य जीवों का कारण ब्रह्मा हैं इसी कारण यह जीव दोनों देहों को धरते हैं और ब्रह्मा जी का कारण