योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
ओषध और रससहित पदार्थ आते हैं, उन्हें पृथ्वी अपने में ही देखती है, वैसे ही मैंने जगत् का अपने में ही देखा।
राम ने पूछा, हे भगवन्! वह जो छन्द का पाठ करनेवाली कमल-नयनी कान्ता थी, उसने फिर क्या किया? वशिष्ठजी बोले, हे राम! वह आकाश शरीर को धारण करके मेरे निकट आई और जैसे भवानी आकाश में आकर स्थित हों, वैसे ही आकर स्थित हुई। जैसे मैं आकाश-शरीर था, वैसे ही उसको भी मैंने आकाश-शरीर देखा। प्रथम मैंने आकाश में इस कारण न देखा कि मेरा आधिभौतिक शरीर था। जब चित्पद होकर में स्थित हुआ, तब वह कान्ता देखी। में आकाशरूप हूँ और वह सुन्दरी भी आकाशरूप है और जगज्जाल जो देखे वे भी आकाशरूप है। श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! तुम भी आकाशरूप थे और वह भी आकाशरूप थी, पर वचन-विलास तो तब होता है, जब शरीर होता है; उसमें बोलने का स्थान कण्ठ, तालु, नासिका, दन्त, होठ और हृदय में फिरनेवाले प्राण होते हैं और अक्षर का उच्चारण होता है। पर तुम दोनों तो निराकार थे; तुमने देखा और बोला किस प्रकार? बोलना, रूप, अवलोक और मनस्कार से होता है- रूप अर्थात् दृश्य, अवलोक अर्थात् इन्द्रियाँ और मनस्कार अर्थात् मन का फुरना- इन तीनों के बिना तुम कैसे बोले? वशिष्ठजी बोले, हे राम! स्वप्न में रूप, अवलोक और मनस्कार; शब्दपाठ और परस्पर वचन जो होते हैं, वे आकाशरूप होते हैं। वैसे ही हमारा देखना, बोलना और आपस में संवाद हुआ था। जैसे स्वप्न में रूप, अवलोक और मनस्कार आकाश-रूप होते हैं और प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं, वैसे ही हमारा देखना और बोलना हुआ। यह प्रश्न तुम्हारा सही नहीं कि देखना और बोलना कैसे हुआ? जैसे आकाश में सृष्टि देखी है, वैसे ही यह सृष्टि भी है; और जैसे उनके शरीर थे, वैसे ही इनके और हमारे शरीर हैं; जैसे यह जगत् है, वैसे ही वह जगत् है।
हे राम! यह आश्चर्य है कि सत् वस्तु नहीं भासित होता और असत् वस्तु भासित होती है। जैसे स्वप्न में पृथ्वी पर्वत, समुद्र और