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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1366, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1366

५६० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे मुनीश्वर ! अज्ञान से मनुष्यों को अहंकाररूपी पिशाच लगा है, सो दृढ़ स्थित हुआ है । जब शास्त्र के वचनों में दृढ़ अभ्यास होता है, तब वह क्षीण हो जाता है । हे मुनीश्वर ! तुम देखो, जिस किसी को इष्ट की प्राप्ति होती है सो अभ्यास के बल से होती है । जो अज्ञानी होता है और ब्रह्म का अभ्यास करता है सो ज्ञानी होता है । पर्वत बड़ा है, परन्तु अभ्यास में कोई उसे चूर्ण किया चाहे तो वह चूर्ण हो जाता है । सम्पूर्ण वृक्ष का खा लेना कठिन है, परन्तु अभ्यास करके शनैः शनैः घुन उसे खा जाता है । आप भी छोटा है, परन्तु जो वस्तु पानी कठिन हो, वह उसे अभ्यास से सुगम हो जाती है । जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु के निकट जाकर जिस पदार्थ की इच्छा करो वह सिद्ध होता है, वैसे ही आत्मरूपी चिन्तामणि और कल्पतरु में जीव जिस पदार्थ का अभ्यास करता है, वह सिद्ध होता है और—अभ्यासरूपी भूमिका फल देती है । बालक अवस्था से जो अभ्यास होता है, वही वृद्धावस्था तक रहता है । हे मुनीश्वर ! जो बान्धव नहीं होता और निकट रहता है तो निकट के अभ्यास से बान्धव हो जाता है, परन्तु बान्धव जो विदेश में रहता है तो अभ्यास की क्षीणता से वह अबान्धव हो जाता है । हे मुनीश्वर ! विष भी अमृत की भावना करने से अभ्यास के द्वारा अमृत हो जाता है । जो मिष्टान्न में कटुक भावना होती है तो वह कटु लगता है और कटु में मिष्टान्न की भावना कीजिये तो वह मिष्टान्न लगता है—जैसे किसी को नीम और किसी को मिष्टान्न प्रिय है ।

हे मुनीश्वर ! जो कुछ सिद्ध होता है, वह अभ्यास के बल से सिद्ध होता है । जो पुण्य किया होता है तो पाप के अभ्यास से नष्ट हो जाता है और पाप का पुण्य के अभ्यास से नाश होता है । माता भी अमाता हो जाती है । अर्थ के अनर्थ हो जाते हैं । मित्र अमित्र हो जाता है और भाग्य अभाग्य हो जाता है । निदान सब पदार्थ चल हो जाते हैं, परन्तु अभ्यास का नाश कदाचित नहीं होता । हे मुनीश्वर ! जो पदार्थ निकट पड़ा होता है और साधक इन्द्रियाँ भी विद्यमान होती हैं, तो भी वह अभ्यास के बिना नहीं प्राप्त होता । जहाँ अभ्यासरूपी