योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही भ्रम से अपने में आधि- भौतिक शरीर भासित होता है। हे राम! यह आश्चर्य है कि सत्य वस्तु असत्य लगती है, और जो असत्य वस्तु है वह सत्य लगती है। इसका कारण अविचार है। यह मोह का माहात्म्य है कि सबका आदि जो प्रत्यक्ष आत्मा है, उसको लोग अप्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जगत् को प्रत्यक्ष जानते हैं। हे राम! यह जगत् भ्रम से भासित होता है और स्वप्न की नाईं मिथ्या है। जिन पदार्थों को लोग सुखरूप मानते हैं, वे दुःख के कारण हैं; क्योंकि उनका परिणाम दुःख है। इनमें प्रथम क्षण- सुख लगता है और फिर उनके वियोग से दुःख होता है, इसी कारण इनका नाम आपातरमणीय है—इनको पाकर शान्तिमान् कोई नहीं होता। जैसे मृगतृष्णा का क्षणसुख होता है और फिर उनके वियोग से दुःख होता है; क्योंकि उस जल को पाकर कोई तृप्त नहीं होता, वैसे ही विषय के सुखों से कोई तृप्त नहीं होता। जो उनमें लगते हैं, वे मूर्ख हैं। जो अत्युत्तम सुख है, वह अनुभव से प्रकाशित होता है। उसको त्यागकर विषय के सुख में जो लगते हैं वे मूर्ख हैं; वे शुद्ध आकाशरूप अनात्मरूप में जगत् देखते हैं। हे राम! जगत् जात हुए की नाईं भासता है तो भी हुआ नहीं—जैसे स्थाणु में पुरुष दिखता है तो भी हुआ नहीं, और जैसे सुवर्ण में भूषण दिखते हैं, वैसे ही यह जगत् प्रत्यक्ष दिखता है, पर कुछ नहीं है। हे राम! प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं है, तब अनुमानादिक प्रमाण कहाँ से सत्य हों? जैसे किस नदी में हाथी बह जाते हैं, उसमें रूई के बहने में क्या आश्चर्य है, वैसे ही प्रत्यक्ष प्रमाण के विषय जगत् को जब असत्य माना तब अनुमानप्रमाण से क्या वह सत् होता है?
हे राम! केवल बोधमात्र में जगत् कुछ बना नहीं। हमको तो सदा ऐसे ही लगता है। पर अज्ञानी को जगत् भासित होता है—जैसे किसी पुरुष को स्वप्न में पर्वत देख पड़ते हैं और जाग्रत् पुरुष को नहीं दिखते, वैसे ही अज्ञानी को यह जगत् दिखता है, पर हमको तो आकाश, समुद्र, पर्वत, सब केवल बोधमात्र लगते हैं। जैसे कथा के