योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1373, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇
<div align="right">५६७</div>आसन पर विराजमान हो और साक्षात् ब्रह्मज्ञान के समुद्र हो यह तुम्हारी शक्ति देवी है, जिसको तुमने भार्या बनाने के लिए उत्पन्न किया था और फिर उसे विरस जानकर त्याग दिया। तुम्हारे वैराग्य से इसको भी वैराग्य उपजा है। इसलिए यह मुझको यहाँ ले आई है कि तुम परमात्मतत्त्व की वाणी से हमको उपदेश करो। सो इसमें इसका क्या अभिप्राय है?
ब्रह्मा बोले, हे मुनीश्वर! मैं शान्त, अजर-अमररूप हूँ और मुझमें उदय-अस्त कदापि नहीं होता। मैं परम आकाशरूप हूँ और अपने आपमें स्थित हूँ। न मेरी कोई स्त्री है और न मैंने किसी को उत्पन्न किया है। तथापि जो वृत्तान्त हुआ है, वह मैं कहता हूँ, क्योंकि महापुरुष के सामने ज्यों का त्यों कहना चाहिए। हे मुनीश्वर! आदि शुद्ध चिदात्मा चिन्मात्र पद है। उसका किञ्चन जो अहं होकर फुरा है, उसका नाम आदि ब्रह्मा है। वही मैं हूँ, जैसे अविष्यत सृष्टि का हो—मतलब यह कि मैं संकल्प-रूप द्रष्टा और संकल्परूप हूँ—पर वास्तव में आकाशरूप सदा निगवरण हूँ और अपने आप ही में मेरी अहंप्रतीति है। उसमें आदि जो संकल्प का फुरना हुआ है, उसमें जगत्-भ्रम रचा है और उस जगद्भ्रम में मर्यादा हुई है। संकल्प की अधिष्ठात्री जो ब्रह्मशक्ति है, वह भी शुद्ध है। हे मुनीश्वर, उस मर्यादा को युगों की सहस्र चौकड़ी बीती हैं—अब कलियुग है। कल्प और महाकल्प की मर्यादा पूरी हुई है, इससे मुझको परम चिदाकाश में स्थित होने की इच्छा हुई है और इसी से इसको नीरस जानकर मैंने त्याग किया है। जब इसका त्याग करूँगा, तब निर्वाणपद को प्राप्त होऊँगा, क्योंकि यह मेरी इच्छा वासनारूप है। वासना का त्याग हो तो निर्वाणपद प्राप्त हो। यह जो शुद्ध चित्तकला है, उसने धारणा का अभ्यास किया था, इससे इसमें अन्तवाहक शक्ति प्राप्त हुई है। अन्तवाहक शक्ति से यह आकाश में उपजी है और संसार से विरक्त हुई है। आकाशमार्ग में इसको तुम्हारी सृष्टि दिखी और परमपद पाने की इच्छा से इसको तुम्हारी संगति प्राप्त हुई—इससे तुम्हारी शरण आई है और तुमको ले आई है। जो श्रेष्ठ हैं वे बड़ों की शरण जाते हैं। यह अपने कल्याण के लिए तुमको ले आई है।