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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1380, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1380

५७२ ❁ योगवासिष्ठ ❁

ज्ञानवान् को यहाँ अनुभव होता है, इसमें तुम भी ऐसे ही समझो ।

इति श्री० यो० निर्वाणप्रकरणे नवाशीत्यधिकशततमोऽसर्गः ॥ १८६ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! बन्धनमोक्ष जगत्-बुद्धि न सत् है और न असत् । उदय भी नहीं हुआ और अस्त भी नहीं होता । केवल ज्यों का त्यों आत्मा स्थित है । ऐसे आपने मुझको उपदेश किया है । इसलिए मैंने जाना है कि आत्मा में जगत् न उपजता है और न मिटता है, पर तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को सुनता हुआ भी मैं तृप्त नहीं होता और अमृत की नाईं पान करता हूँ । जगत् सत्-असत् से रहित सन्मात्र है, उसको मैंने जाना है । अब यह कहिये कि संसार भ्रम कैसे उपजता है और उसका अनुभव कैसे होता है ? वसिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ तुमको स्थावर-जङ्गम जगत् सब प्रकार देशकाल-संयुक्त दीखता है, उसके नाश का नाम महाप्रलय है । उसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र भी लीन हो जाते हैं । उसके पीछे जो शेष रहता है, वह स्वच्छ, अज, अनादि, केवल आत्मतत्त्वमात्र है—उसमें वाणी की गति नहीं । वह केवल अपने आपमें स्थित और परम सूक्ष्म है, जिसमें आकाश भी स्थूल है । जैसे सुमेरुपर्वत के आगे राई का दाना सूक्ष्म है, वैसे ही आकाश से भी आत्मा सूक्ष्म है और संवेदन से रहित चिन्मात्र है । उसमें अहं किञ्चन होकर फुरा है । आत्मा सदा निर्विकल्प और समुद्र-सदृश, देशकाल के भ्रम से रहित और केवल चैतन्यघन अपने आपमें स्थित है । जैसे स्वप्न में अपने भाव को लेकर जीव स्थित होता है, वैसे ही आत्मा अपने भाव को लेकर चेतन किञ्चन होता है । उसी का नाम ब्रह्मा है, और वह भी चिद्रूप है । हे राम ! चित्अणु जो अपने भाव को लेकर उदय हुआ है, उसने चेत्यनाम दृश्य को देखा । इससे उसका अनुभव मिथ्या हुआ । जैसे स्वप्न में कोई अपना मरण देखता है, सो वह अनुभव मिथ्या है; वैसे ही चित्अणु दृष्टि में दृश्य को देखता है । यह मिथ्यादृष्टि है । चित्अणु अपने स्वरूप को देखता है, सो केवल निराकाररूप है, परन्तु अहंश्रूप बीज दृढ़ होता है, उससे अपने आपसे निकले संकल्प से दृश्य को देखता है ।