योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1396, कुल 1734 में से
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आपमें जानती थी। जैसे समुद्र सब तरङ्गों को अपने में अपना रूप जानता है, वैसे ही सब ब्रह्माण्ड को वह अपने में अपना रूप जानती थी। वह तो सदाशिव से भी बड़े अहंकार को धारण किये थी, मानों सब ब्रह्माण्ड की माला कण्ठ में डाले है और यमादिक सब उसकी मर्यादा हैं।
हे राम! इस प्रकार मैंने रुद्र और काली भवानी को देखा। रुद्र के शिर पर जो जटा थी, वे मोर की पंख की नाईं थीं। काली को मैंने देखा कि नाना प्रकार के मृग उसके साथ हैं और वह डम-डम शब्द करती है। यह शब्द भी वह करती थी—"दिग्वंटिग्वं तुदिग्वं पंचमना वह संमंभप्रलये मियतयत्रिषंत्रो त्रीलं त्रीपलपलुमं पनुपं सुमंप मषमश्रिणु ही गुंहींगुंहीं उगुभियगुं दलुमददारो मीदातंदर्ता।" हे राम! इस प्रकार के शब्द करती हुई वह श्मशानों में नृत्य करती थी। हे राम! ऐसी देवी तुम्हारी सहायक हो, जो सर्वशक्ति परमात्मा है और सब ब्रह्माण्ड उसके आश्रय है। क्षण में वह अंगुष्ठप्रमाण हो जाती थी और क्षण में बड़े दीर्घ आकार धारण करती थी। सब जगत् में जो क्रिया होती है, वे उसके आश्रय से होती हैं। कहीं उत्पत्ति होती है, कहीं युद्ध होते हैं। ऐसी नाना प्रकार की क्रिया उस देवी के आश्रय से होती हैं। जैसे आइने में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही उस देवी में क्रिया होती हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे देवीरुद्रोपाख्यानवर्णनन्नाम शताधिकपण्णवतिमस्सर्गः ॥ १६६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो तुमने रुद्र और कालिका का वर्णन किया, सो वे कौन थे? महाप्रलय में तो कुछ नहीं रहता। उनके शरीर में तुमने सृष्टि कैसे देखी और महाप्रलय होकर उनके शरीर में सृष्टि ने कैसे प्रवेश किया? उस काली के हाथ में शस्त्र क्या थे? कहाँ से आई थी और कहाँ गई? उसका आकार क्या था? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई रुद्र है, न काली है, न कोई पुरुष है, न कोई स्त्री है, न कोई नपुंसक है, न पुरुष। मिलकर कुछ नहीं हुआ है। न ब्रह्माण्ड है और न पिण्ड है केवल चिदाकाश है और संकल्प से उपजे सब