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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1448, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1448

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६४३

संवित् ही पुरुषरूप है। जिसको उसमें निश्चय है, वह ज्ञानवान् है और उसको द्वैतकलना नहीं फुरती। और जो प्रत्यक्ष दृष्टिगत भी होती है तो उसके निश्चय में नहीं होती है। जैसे आकाश में धूल दिखती है, परन्तु उमे स्पर्श नहीं करती, वैमे ही ज्ञानवान् को द्वैत-कलना स्पर्श नहीं करती। जिस चैतन्य संवित् में फुरने का सम्बन्ध है, उसको जगत् का आकार दिखता है, और जिस पुरुष की संवित् में देश, काल, क्रिया और द्रव्य का सम्बन्ध है, वह कलङ्क में दृढ़ हो रहा है। और जो अपने वास्तव अद्वैत स्वरूप के अभ्यास से मार्जन नहीं करता, वह वास्तव चैतन्य आकाशरूप होने पर भी कलङ्क में वासना के अनुसार जगत् उसे अपने से भिन्न लगता है—द्वैतभ्रम नहीं मिटता। हे राम ! जो पुरुष ऐसा है कि देह के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में सम रहना है, पर उसे आत्मसत्ता ज्यों की त्यों नहीं भामती, तो वह अज्ञानी है। आत्मसत्ता जाने बिना उनका संसार निवृत्त नहीं होता। जब आत्म-सत्ता का साक्षात्कार होगा, तभी सब भ्रम निवृत्त होगा। हे राम ! यह पुरुष न जीव है, न स्फुरण है और न शरीर का नाश होने से इसका नाश होता है। यह केवल चिन्मात्रस्वरूप है, पर वासना से भ्रम को देखता है। शून्यवादी लोग वृक्ष, पर्वत आदि जड़ योनि पाते हैं जो सदा अनुभव स्वरूप है, उसको त्यागकर जो और को इष्ट मानते हैं वे मूर्ख हैं और उनको आत्मसुख नहीं प्राप्त होता। आत्मा के प्रमाद से अहं, त्वं, भीतर, बाहर आदि शब्द भासित होते हैं। जब आत्मज्ञान हुआ, तब सब शब्द आत्मरूप हो जाते हैं। जिन पुरुषों ने आत्म-अनात्म को निर्णय करके नहीं देखा, वे पुरुषों में नीच हैं। जिस पुरुष ने निर्णय करके आत्मा में अहं-प्रतीति की है और अनात्म का त्याग किया है, वह महापुरुष है। उसे मेरा नमस्कार है। जिसने अनात्मा में अहंप्रतीति की है और आत्मा का त्याग किया है, वह बालक है। जैसे आकाश में बादल ही हाथी और घोड़े के आकार में दिखते हैं और समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैमे ही आत्मा में जगत् दिखता है। पर द्वैत कुछ नहीं है। जैसे स्वप्न के नगर अपने-अपने अनुभव में स्थित