योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४८ योगवाशिष्ठ ।
है और अजड़ है पर जड़ के समान स्थित है वह परमात्मा का रूप है और जो सबके भीतर बाहर स्थित है और सबको प्रकाशता है सो पर-मात्मा का रूप है। हे रामजी ! जैसे सूर्य प्रकाशरूप और आकाश शून्यरूप है वैसे ही यह जगत् आत्मरूप है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो सब परमात्मा ही है तो क्यों नहीं भासता और जो सब जगत् भासता है इसका निर्वाण कैसे हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जगत् भ्रम से उत्पन्न हुआ है—वास्तव में कुछ नहीं है। जैसे आकाश में नीलता भासती है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। जब जगत् का अत्यन्त अभाव जानोगे तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा और किसी उपाय से न होगा। जब दृश्य का अत्यन्त अभाव करोगे तब दृश्य उसी प्रकार स्थित रहेगा, पर तुमको परमार्थ सत्ता ही भासेगी। हे रामजी ! चितरूपी आदर्श दृश्य के प्रतिबिम्ब बिना कदाचित् नहीं रहता। जब तक दृश्य का अत्यन्त अभाव नहीं होता तब तक परम बोध का साक्षात्कार नहीं होता। इतना सुनकर रामजी ने फिर पूछा कि हे भगवन् ! यह दृश्य-जाल आडम्बर मन में कैसे स्थित हुआ है ? जैसे सरसों के दानों में सुमेरु का आना आश्चर्य है वैसे ही जगत् का मन में आना भी आश्चर्य है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक दिन तुम वेदधर्म की प्रवृत्ति सहित सकाम यज्ञ योगादिक त्रिगुण से रहित होकर स्थित हो और सत्संग और सतशास्त्रपरायण हो तब मैं एक ही क्षण में दृश्यरूपी मैल दूर करूँगा। जैसे सूर्य की किरणों के जाने से जल का अभाव हो जाता है वैसे ही तुम्हारे भ्रम का अभाव हो जावेगा। जब दृश्य का अभाव हुआ तब द्रष्टा भी शान्त होवेगा और दोनों का अभाव हुआ तब पीछे शुद्ध आत्मसत्ता ही भासेगी। हे रामजी ! जब तक द्रष्टा है तब तक दृश्य है और जब तक दृश्य है तब तक द्रष्टा है। जैसे एक की अपेक्षा से दो होते हैं—दो हैं तो एक है और एक है तब दो भी हैं—एक न हो तब दो कहाँ से हों—वैसे ही एक के अभाव से दोनों का अभाव होता है। द्रष्टा की अपेक्षा से ही दृश्य और दृश्य की अपेक्षा करके द्रष्टा है। एक के अभाव से दोनों का अभाव हो जाता है। हे रामजी ! अहंता