योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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एक का अभाव हो तो दोनों मुक्त हों, क्योंकि जहाँ द्रष्टा है वहाँ दृश्य भी है और जहाँ दृश्य है वहाँ द्रष्टा भी है। जैसे शुद्ध आदर्श के बिना प्रतिबिम्ब नहीं होता वैसे ही द्रष्टा भी दृश्य के बिना नहीं रहता और दृश्य द्रष्टा के बिना नहीं। हे मुनीश्वर ! दोनों में एक नष्ट हो तो दोनों निर्वाण हों इससे वही युक्ति कहो जिससे दृश्य का अत्यन्त अभाव होकर आत्म-बोध प्राप्त हो। कोई ऐसा भी कहते हैं कि दृश्य आगे या अब नष्ट हुआ है तो उसको भी संसारभाव दिखावेगा और जिसको विद्यमान नहीं भासता और उसके अन्तर सद्भाव है तो फिर संसार देखेगा। जैसे सूक्ष्म बीज में वृक्ष का सद्भाव होता है वैसे ही स्मृति फिर संसार को दिखावेगा और आप कहते हैं कि जगत् का अत्यन्त अभाव होता है और जगत् का कारण कोई नहीं—आभासमात्र है—और उपजा कुछ नहीं ? हे मुनी-श्वर ! जिसका अत्यन्त अभाव होता है वह वस्तु वास्तव में नहीं होती और जो है ही नहीं तो बन्धन किसको हुआ तब तो सब मुक्तस्वरूप हुए पर जगत् तो प्रत्यक्ष भासता है ? इससे आप वही युक्ति कहो जिससे जगत् का अत्यन्त अभाव हो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दृश्य के अत्यन्त अभाव के निमित्त मैं एक कथा सुनाता हूँ; जिसका अर्थ निश्चयकर समझने से दृश्य शान्त होकर फिर संसार कदाचित् न उपजेगा। जैसे समुद्र में धूल नहीं उड़ती वैसे ही तुम्हारे हृदय में संसार न रहेगा । हे रामजी ! यह जगत् जो तुमको भासता है सो अकारणरूप है; इसका कारण कोई नहीं । हे रामजी । जिसका कारण कोई न हो और भासे उसको जानिये कि भ्रममात्र—है उसका उपजा कुछ नहीं जैसे स्वप्न में सृष्टि भासती है वह किसी कारण से नहीं उपजी केवल संवित्रूप है वैसे ही सर्ग आदि कारण से नहीं उपजा केवल आभास-रूप है—परमात्मा में कुछ नहीं । हे रामजी ! जो पदार्थ कारण बिना भासे तो जिसमें वह भासता है वही वस्तु उसका अधिष्ठानरूप है । जैसे तुमको स्वप्न में स्वप्न का नगर होकर भासता है पर वहाँ तो कोई पदार्थ नहीं केवल आभासरूप है और संवित् ज्ञान ही चैतन्यता से नगर होकर भासता है, वैसे ही विश्व अकारण आभास आत्मसत्ता में