योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 1734 में से
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की तब चक्षु इन्द्रिय प्रकट हुई; जब स्पर्श की इच्छा की तो त्वचा इन्द्रिय प्रकट हुई और जब रस लेने की इच्छा की तो जिह्वा इन्द्रिय प्रकट हुई । इसी प्रकार से देह इन्द्रियाँ चैतन्यता से भासीं और उसमें यह जीव अहंप्रतीति करने लगा । हे रामजी ! जैसे दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है वह पर्वत से बाह्य है वैसे ही देह और इन्द्रियां बाह्य दृश्य हैं पर अपने में भासी हैं इससे उसमें अहं प्रतीति होती है । जैसे कूप में मनुष्य आपको देखे वैसे ही देह में आपको देखता है जैसे डब्बे में रत्न होता है वैसे ही देह में आपको देखता है । वही चिदअणु देह के साथ मिलकर दृश्य को रचता है । उस अहं से ही क्रिया भासने लगी । जैसे स्वप्न में दौड़े और जैसे स्थित में स्पन्द होती है वैसे ही आत्मा में जो स्पन्द क्रिया हुई वह चित्त-संवित् से ही हुई है और उसी का नाम स्वयम्भू ब्रह्मा हुआ । जैसे संकल्प से दूसरा चन्द्रमा भासता है वैसे ही मनोपम जगत् भासता है । जैसे शश के शृङ्ग होते हैं वैसे ही यह जगत् है । कुछ उपजा नहीं केवल चित्त के स्पन्द में जगत् फुरता है । जैसे-जैसे चित्त फुरता गया वैसे वैसे देश, काल, द्रव्य, स्थावर, जङ्गम, जगत् की मर्यादा हुई । इससे सब जगत् सङ्कल्परूप है, सङ्कल्प से इतर जगत् का आकार कुछ नहीं । जब सङ्कल्प फुरता है तब आगे जगत् दृश्य भासता है और संकल्प निस्पन्द होता है तब दृश्य का अभाव होता है । हे रामजी ! इस प्रकार से यह ब्रह्मा निर्वाण हो फिर और उपजते हैं इससे सब संकल्पमात्र ही है । जैसे नटवा नाना प्रकार के पट के स्वांग करके बाहर निकल आता है वैसे ही देखो यह सब मायामात्र है । हे रामजी ! जब चित्त की ओर संसरता है तब दृश्य का अन्त नहीं आता और जब अन्तर्मुख होता है तब सब जगत् आत्मरूप होता है । चित्त के निस्पन्द होने से एक क्षण में जगत् निवृत्त होता है क्योंकि सङ्कल्परूप ही है । इसमें यह जगत् आकाशरूप है उपजा कुछ नहीं और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है । जैसे स्वप्न में पर्वत और नदियाँ भ्रम में दीखते हैं वैसे ही यह जगत् भी भ्रम में भासता है । जैसे स्वप्न में आपको मुआ देखता है सो भ्रममात्र है वैसे ही यह जगत्