भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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उत्पत्ति प्रकरण । १६६

हैं और चित्तशक्ति ही ऐसे होकर भासती है । जैसे वसन्त ऋतु आती है तो रसाशक्ति से वृक्ष और बेलें सब प्रफुल्लित होकर भासती हैं वैसे ही चित्तशक्ति को स्पन्दता ही जगतरूप होकर भासती है । हे रामजी ! जैसे वायु स्पन्दता से भासती है वैसे ही जगत् फुरने से भासता है वैसे ही चित्तसंविद् जगतरूप होकर भासना है फुरने से ही जगत् है और कोई वस्तु नहीं है, इसी से जगत् कुछ नहीं है । जैसे समुद्र तरङ्गरूप होकर भासता है, वैसे ही आत्मा जगतरूप होकर भासता है । इससे जगत् दृश्य-भाव से भासता है पर संवित् से कुछ नहीं । वायु जड़ और आत्मा चैतन्य है और जल भी परिणाम से तरङ्गरूप होता है, आत्मा अच्युत और निराकार है । हे रामजी ! चैतन्यरूप रत्न है और जगत् उसका चमत्कार है अथवा चैतन्यरूपी अग्नि में जगतरूपी उष्णता है । हे रामजी ! चैतन्य प्रकाश ही भौतिक प्रकाशरूप होकर भासता है, इससे जगत् है, और वास्तव से नहीं । चैतन्य सत्ता ही शून्य आकाशरूप होकर भासती है ! इस भाव से जगत् है वास्तव में नहीं हुआ । इससे जगत् कुछ नहीं चेतनसत्ता ही पृथ्वीरूप होकर भासती है, दृष्टि में आता है इससे जगत् है पर आत्मसत्ता से इतर कुछ नहीं हुआ । चैतन्य रूप घन अन्धकार में जगतरूपी कृष्णता है, अथवा चैतन्यरूपी काजल का पहाड़ है और जगतरूपी उसका परमाणु भ्रम है और चैतन्यरूपी सूर्य में जगतरूपी दिन है, आत्मरूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग है, आत्मरूपी कुसुम में जगतरूपी सुगन्ध है, आत्मरूपी वरफ में शुक्लता और शीत-लतारूपी जगत् है, आत्मरूपी बेलि में जगतरूपी फूल है, आत्मरूपी स्वर्ण में जगतरूपी भूषण है; आत्मरूपी पर्वत में जगतरूपी जड़ सघनता है, आत्मरूपी अग्नि में जगतरूपी प्रकाश है, आत्मरूपी आकाश में जगतरूपी शून्यता है, आत्मरूपी ईख में जगतरूपी मधुरता है; आत्म-रूपी दूध में जगतरूपी घृत है, आत्मरूपी मधु में जगतरूपी मधुरता है अथवा आत्मरूपी सूर्य में जगतरूपी जलाभास है और नहीं है । हे रामजी ! इस प्रकार देखो कि जो सर्व, ब्रह्म, नित्य, शुद्ध, परमानन्द-स्वरूप है वह सर्वदा अपने आप में स्थित है-भेद कल्पना कोई नहीं ।