योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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नहीं । इससे अधिक क्या कहिये । यह जो मोक्ष-उपाय मैंने तुमसे कहा वह परमपावन है । यह संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, दुःखरूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है और सुखरूपी कमल की खानि का तालाब है । जो पुरुष इसका बारम्बार विचार करेगा, वह यदि महामूर्ख हो तो भी शान्तपद को प्राप्त होगा । जो कोई इस मोक्ष-उपाय को पढ़ेगा, कहेगा, सुनेगा, लिखेगा, अथवा लिखकर पुस्तक देगा, उसके हृदय में जो कामना होगी, वह पूर्ण होगी । वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा और राजसूययज्ञ का फल पावेगा । फिर विचारकर ज्ञान पाकर मुक्त होगा ।
हे अङ्ग ! यह मोक्ष उपाय बड़ा शास्त्र है । इसमें बड़ी कथा है और नाना प्रकार की युक्तियाँ हैं । जिन कथाओं और युक्तियों से वशिष्ठजी ने राम को जगाया था, वे मैंने तुझको सुनाई हैं । अपने उपदेश से उन्होंने उनको जीवन्मुक्त किया था और कहा था कि तुम राजलक्ष्मी भोगो । वही मैंने भी तुमसे कहा है कि जीवन्मुक्त होकर अपने तपकर्म में सावधान हो रहो, और आत्मसत्ता में निश्चय रखना । जिस उपदेश से रघुवंशी कृतकृत्य हुए, वह मैंने तुमसे ज्यों का त्यों कहा है । इस निश्चय को रखकर कृतकृत्य हो जाय । इसमें जितने इतिहास और कथा हैं, उनके भिन्न-भिन्न नाम सुनो । वैराग्यप्रकरण में राम के सम्पूर्ण प्रश्न हैं । मुमुक्षुप्रकरण में शुक्रनिर्वाण ही कहा है । उत्पत्तिप्रकरण में ये आठ आख्यान कहे हैं—एक आकाशज का, दूसरा लीला का, तीसरा सूची का, चतुर्थ इन्द्र-ब्राह्मण के पुत्रों का, पञ्चम कृत्रिम इन्द्र और अहल्या का, छठा चित्तोपाख्यान, सप्तम वाल्मीकि की कथा और अष्टम साम्बर का आख्यान । स्थितिप्रकरण में चार आख्यान हैं—एक भृगु के पुत्र का, दूसरा दामब्याल और कट का, तीसरा भीम, भास, दृढ का और चतुर्थ दासुर का । उपशमप्रकरण में एकादश आख्यान कहे हैं—एक जनक की सिद्धगीता, दूसरा पुण्यपावन, तीसरा बलि को विज्ञान की प्राप्ति का वृत्तान्त, चतुर्थ प्रह्लादविश्रान्ति, पञ्चम गाधि का वृत्तान्त, छठा उद्दालकनिर्वाण, सप्तम स्वर्गनिश्चय, अष्टम परिघनिश्चय, नवम भास,