भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 207
२१०योगवाशिष्ठ ।

और तीसरा भूताकाश है । उनमें वास्तव एक चिदाकाश है और भावना करके भिन्न २ कल्पना हुई है । आदि शुद्ध अचेत्, चिन्मात्र चिदाकाश में जो संवेदन फुरा है उसका नाम चित्ताकाश है और उसी में यह सम्पूर्ण जगत् हुआ है । हे रामजी ! चित्तरूपी शरीर सर्वगत होकर स्थित हुआ है जैसा जैसा उसमें स्पन्द होता है वैसा ही वैसा होके भासता है । जितने कुछ पदार्थ हैं उन सबों में व्याप रहा है; त्रसरेणु के अन्तर भी सूक्ष्मभाव से स्थित हुआ और आकाश के अन्तर भी व्याप रहा है । पत्र फल उसी से होते हैं, जल में तरङ्ग होके स्थित हुआ है; पर्वत के भीतर यही फुरता, मेघ होके भी यही वर्षता और जल से वरफ भी यह चित्त ही होता है । अनन्त आकाश परमाणुरूप भीतर बाहर सर्वजगत् में यही है । जितना जगत् है वह चित्तरूप ही है और वास्तव में आत्मा से अनन्त रूप है । जैसे समुद्र और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं वैसे ही आत्मा और चित्त में कुछ भेद नहीं । जिस पुरुष को ऐसे अखण्डसत्ता आत्मा का अनुभव हुआ है और जिसका सर्ग के आदि में चित्त ही शरीर है और आधिभौतिकता को नहीं प्राप्त हुआ वह महाआकाशरूप है उसको पूर्व का स्वभाव स्मरण रहा है इस कारण उसका अन्तवाहक शरीर है । हे रामजी ! जिस पुरुष को अन्तवाहकता में अहंप्रत्यय है उसको सब जगत् संकल्पमात्र भासता है वह जहाँ जाने की इच्छा करता है वहाँ जाता है । उसको कोई आवरण नहीं रोक सकता । जिसको आधिभौतिकता में निश्चय है उसको अन्तवाहक शक्ति नहीं होती । हे रामजी ! सबही अन्तवाहकरूप हैं और भ्रम से अनहोता आधिभौतिकता देखते हैं । जैसे मरुस्थल में जल भासता है और जैसे स्वप्न में बन्ध्या के पुत्र का सद्भाव होता है वैसे ही आधिभौतिक जगत् भासता है । जैसे जल शीतलता से वरफ हो जाता है वैसे ही जीव प्रमाद से अन्तवाहक से आधिभौतिक शरीर होता है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! चित्त में क्या है; कैसे होता है और कैसे नहीं होता; यह जगत् कैसे चित्तरूप है और क्षण में अन्यथा कैसे हो जाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक एक जीव प्रति चित्त होता है । जैसा जैसा चित्त है वैसी ही वैसी