भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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२२ योगवासिष्ठ ।

देखकर कहते हैं कि ये "पशु हैं-आशारूपी फांसी में बंधे हुए हैं" । हे राजन् ! जो कुछ योग्य पदार्थ हैं उनको देखकर उनका चित्त प्रसन्न नहीं होता बल्कि देखकर क्रोधवान् होते हैं । जैसे पपीहा मारवाड़ में जावे तो मेघों की बूंदों को नहीं देखता और खेदवान् होता है वैसे ही रामजी विषयों से खेदवान् होते हैं । इससे हम जानते हैं कि उनको परमपद पाने की इच्छा है परन्तु कदाचित् उनके मुख से यह नहीं सुना । त्याग का भी अभिमान उन्हें कदाचित् नहीं है क्योंकि कभी गाते हैं और बोलते हैं तो कहते हैं, "हाय में अनाथ मारा गया ! अरे मूर्खों ! तुम संसार समुद्र में क्यों डूबते हो ? यह संसार अनर्थ का कारण है । इसमें सुख कदापि नहीं है इससे छूटने का उपाय करो"। वह किसी के साथ बोलते नहीं और न हँसते हैं; किसी अति चिन्ता में डूबे हैं । वह किसी पदार्थ से आश्चर्यवान् भी नहीं होते । जो कोई कहे कि आकाश में बाग लगा है और उसमें फूल फूले हैं । उनको मैं ले आया; तो उसको सुनकर भी आश्चर्यवान् नहीं होते, सब भ्रममात्र समझते हैं । उनको न किसी पदार्थ से हर्ष होता है, न किसी से शोक होता है; किसी बड़ी चिन्ता में मग्न हैं पर उस चिन्ता के निवारण करने की किसी में सामर्थ्य नहीं देखते । हे राजन् ! हमको यह चिन्ता लग रही है कि रामजी को खाने पहिरने, बोलने और देखने की इच्छा नहीं रही । और न किसी कर्म की उनको इच्छा है ऐसा न हो कि कहीं मृतक हो जायें । जो कोई कहता है कि तुम चक्रवर्ती राजा हो तुम्हारी बड़ी आयु हो, और बड़ा सुख पावो तो उसके वचन सुनकर कठोर बोलते हैं । हे राजन् ! केवल रामजी की ही ऐसी चिन्ता नहीं वरन् लक्ष्मण और शत्रुघ्न को भी ऐसे ही चिन्ता लग रही है । जो कोई उनकी चिन्ता दूर करनेवाला हो तो करे नहीं तो बड़ी चिन्ता में डूबे रहेंगे । राजन् ! अब क्या कहते हो ? तुम्हारे पुत्र सबसे विरक्त हो एक वस्त्र ओढ़े बैठे हैं । इससे अब तुम वही उपाय करो जिससे उनकी चिन्ता निवृत्त हो । इतना सुन विश्वामित्रजी बोले हे साधो ! यदि रामजी ऐसे हैं तो हमारे पास लावो, हम उनका दुःख निवृत्त करेंगे । हे राजन्, दशरथ ! तुम धन्य हो; जिसका पुत्र विवेक और वैराग्य को प्राप्त