योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण ।
चिदाकाश में मनन और स्मरण है। जैसे तरङ्ग भी जलरूप हैं और जल ही में होते हैं; जल से इतर तरङ्ग कुछ वस्तु नहीं हैं; वैसे ही मनन और स्मरण भी चिदाकाशरूप जानों। हे रामजी! दृश्य कुछ भिन्न वस्तु नहीं है; द्रष्टा ही दृश्य की नाईं होकर भासता है। जैसे मनाकाश नाना प्रकार हो भासता है वैसे ही चिदाकाश का प्रकाश नाना प्रकार जगत् होकर भासता है। यह विश्व सब चिदाकाशरूप है। हमको तो ऐसे ही भासता है पर तुमको अर्थाकाशरूप भासता है, इसी कारण कहा कि लीला और सरस्वती आकाशरूप, सर्वज्ञ स्वच्छरूप और निराकार थीं। वे जहाँ चाहती थीं वहाँ जाय प्राप्त होती थीं और जैसी इच्छा करती थीं वैसी सिद्धि होती थी, क्योंकि जिसको चिदाकाश का अनुभव हुआ है उसको कोई रोक नहीं सकता। सर्वरूप होकर जो स्थित हुआ उसे गृह में प्रवेश करना क्या आश्चर्य है। वह तो अन्तवाहक रूप है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने स्मृत्यनुभववर्णनन्नामा- ष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब दोनों देवियाँ जिनकी चन्द्रमा के समान कान्ति थी राजा के अन्तःपुर में संकल्प मे प्रवेशकर सिंहासन पर स्थित हुईं तो बड़ा प्रकाश अन्तःपुर में हुआ और शीतलता से व्याधि ताप शान्त हुआ। जैसे नन्दनवन होता है वैसे ही अन्तःपुर हो गया और जैसे प्रातःकाल में सूर्य का प्रकाश होता है वैसे ही देवियों के प्रकाश से अन्तःपुर पूर्ण हुआ, मानों देवियों के प्रकाश से राजा पर अमृत की सींचना हुई। तब राजा ने देखा कि मानों सुमेरु के शृङ्ग से दो चन्द्रमा उदय हुए हैं। ऐसे देख के वह विस्मय को प्राप्त हुआ और चिन्तना की कि ये देवियाँ हैं। इसलिये जैसे शेषनाग की शय्या मे विष्णु भगवान् उठते हैं वैसे ही उसने उठके और वस्त्रों को एक ओर करके हाथों में पुष्प लिये और हाथ जोड़ के देवियों के चरणों पर चढ़ाये और माथा टेक के पद्मासन बाँध पृथ्वी पर बैठ गया और कहने लगा, हे देवियो! तुम्हारी जय हो। तुम जन्म दुःख ताप के शान्त करनेवाले चन्द्रमा हो और अपूर्व सूर्य हो-अर्थात् पूर्व सूर्य के प्रकाश से बाह्यतम नष्ट