योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २१८ | योगवाशिष्ठ । |
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आत्मा से फुरे हैं और वास्तव में कुछ नहीं हुआ । केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और भ्रम से ओर कुछ भासता है, पर शुद्धविज्ञानघनरूप ही उसका शेष रहता है । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब देवी और विदूरथ का संवाद वशिष्ठजी ने रामजी से कहा तब सूर्य अस्त होकर सायङ्काल का समय हुआ और सब सभा परस्पर नमस्कार करके स्नान को गई । जब रात्रि बीत गई सूर्य की किरणों के निकलते ही सब अपने स्थानों पर आके बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे लीलोपाख्याने भ्रान्तिविचारो नामैकोनत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो पुरुष अबोध है अर्थात् परमपद में स्थित नहीं हुए उनको जगत् वज्रसार की नाईं दृढ़ है । जैसे मूर्ख बालक को अपनी परछाहीं वैताल भासता है वैसे ही अज्ञानी को असतरूप जगत् सत् ही भासता है और जैसे मरुस्थल में मृग को असतरूप जलाभास सत्य हो भासता है; स्वप्ने में किया अर्थभ्रम करके भासते हैं; जिसको सुवर्णबुद्धि नहीं होती उसको भूषणबुद्धि सत् भासती है और जैसे नेत्रदूषण से आकाश में मुक्तमाला भासती है वैसे ही असम्यग्दर्शी को असतरूप जगत् सत् हो भासता है । हे रामजी ! यह जगत् दीर्घकाल का स्वप्ना है, अहन्ता से दृढ़ जाग्रतरूप हो भासता है और वास्तव में कुछ उपजा नहीं । परमचिदाकाश सर्वदा शान्ति और अचिन्त्य चिन्मात्र स्वरूप सर्वशक्ति सर्व आत्मा ही है; जहाँ जैसा स्पन्द फुरता है वैसा ही जगत् होकर भासता है जैसे स्वप्नसृष्टि भासती है वह स्वप्नभ्रम चिदाकाश में स्थित है । उसे चिदाकाश में एक स्वप्नपुर फुरता है और वहाँ द्रष्टा हो दृश्य को देखता है । वह द्रष्टा और दृश्य दोनों चेतन संवित् में आभासरूप हैं वैसे ही यह जगत् भी आभासरूप है । हे रामजी ! सर्ग का आदि जो शुद्ध आत्मसत्ता थी उसमें आदि संवेदन स्पन्द हुआ है—वहाँ ब्रह्माजी हैं और उसी के संकल्प में वह सम्पूर्ण जगत् स्थित है । यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्न की नाईं हैं; उस स्वप्नरूप में तुम्हारा सद्भाव हुआ है । जैसे तुम हो वैसे ही और भी हैं । जैसे स्वप्न में स्वप्ननगर को और