योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 226, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २२६
हो गये । जब पहाड़ उड़ उड़के सिद्ध की सेना पर पड़े तब सिद्ध ने वज्र रूप अस्त्र चलाया जिससे पर्वत नष्ट हुए । जब इस प्रकार वज्र वर्षे तब विदूरथ ने ब्रह्म अस्त्र चलाया जिससे वज्र नष्ट हुए और ब्रह्म अस्त्र अन्त-र्धान हो गये । हे रामजी ! इस प्रकार परस्पर इनका युद्ध होता था । जो अस्त्र सिद्ध चलावे उसको विदूरथ विदारण करे और जो विदूरथ चलावे उसको सिद्ध विदारण कर डाले । निदान विदूरथ राजा ने एक ऐसा अस्त्र चलाया कि राजा सिद्ध का रथ चूर्ण हो गया और घोड़े भी सब चौपट कर डाले । तब सिद्ध राजा ने रथ से उतर ऐसा अस्त्र चलाया कि विदूरथ का रथ और घोड़े नष्ट हुए और दोनों ढाल और तलवार लेकर युद्ध करने लगे । फिर दोनों रथवाहक और रथ ले आये, उसके ऊपर दोनों आरूढ़ होकर युद्ध करने लगे । विदूरथ ने सिद्ध पर एक बरछी चलाई जो उसके हृदय में लगी और रुधिर चला । तब उसको देख लीला ने देवी से कहा, हे देवि ! मेरे भर्त्ता की जय हुई है । हे रामजी ! इस प्रकार लीला कहती ही थी कि सिद्ध ने बरछी चलाई सो विदूरथ के हृदय में लगी और उसको देख के विदूरथ की लीला शोक-वान् होकर कहने लगी, हे देवि ! मेरा भर्त्ता है; दुष्ट सिद्ध ने बड़ा कष्ट दिया है । हे रामजी ! फिर सिद्ध ने एक ऐसा खड्ग चलाया कि जिससे विदूरथ के पाँव कट गये और घोड़े भी कट गये पर तो भी विदूरथ युद्ध करता रहा । फिर सिद्ध ने विदूरथ के शिर पर खड्ग का प्रहार किया तो वह मूर्च्छा खाके गिर पड़ा । ऐसे देखके उसके सारथी रथ को गृह में ले आने लगे तो सिद्ध उसके पीछे दौड़ा कि मैं इसका शीश ले आऊँ, परन्तु पकड़ न सका । जैसे अग्नि में मच्छर प्रवेश नहीं कर सकता वैसे ही देवी के प्रभाव से विदूरथ को वह न पकड़ सका ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे विदूरथमरणवर्णनंनाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तब सारथी राजा को गृह में ले आया तो स्त्रियाँ, मन्त्री, बान्धव और कुटुम्बी रुदन करने लगे और बड़े शब्द होने लगे । सिद्ध की सेना लूटने लगी । हाथी, घोड़े, स्वामी बिना फिरते