भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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उत्पत्ति प्रकरण । २४१


है तब वह जर्जरीभूत हो जाता है और घन पाषाण की नाई सहस्रों वर्षों तक मूर्च्छा में पड़ा रहता है। कितने ऐसे जीव हैं जिनको उस मूर्च्छा में भी दुःख होता है। बाहर इन्द्रियों को दुःख होता है तब उसके रागद्वेष को लेकर चित्त की वृत्ति हृदय में स्थित होती है वैसे ही पाप-वासना का दुःख हृदय में होता है और भीतर से जलता है। इस प्रकार जड़ीभूत मूर्च्छा में रहता है। इसके अनन्तर उसको फिर चैतन्यता फुर आती है तब अपने साथ शरीर देखता है। फिर नरक भोगता है और चिरकाल पर्यन्त नरक भोग के बहुतेरे जन्म पशु आदिकों के लेता है और महानीच और दरिद्री निर्धनों के गृह में जन्म लेकर वहाँ भी दुःखों से तप्त रहता है। हे लीले ! यह महापापियों की मृत्यु तुझसे कही। अब मध्यम पापी की मृत्यु सुन। जब मध्यम पापी की मृत्यु होती है तब वह भी वृक्ष की नाईं मूर्च्छा से जड़ीभूत हो जाता है और भीतर दुःख से जलता है। जड़ीभूत से थोड़े काल में फिर चेतनता पाता है। फिर नरक भुगत्तता है और नरक भोग के तिर्यगादिक योनि भुगत्तता है। उसके पीछे वासना के अनुसार मनुष्य-शरीर पाता है। अब अल्प पापी की मृत्यु सुनो। हे लीले ! जब अल्पपापी मृतक होता है तब मूर्च्छित हो जाता है और कुछ काल में उसको चेतनता फुरती है। फिर नरक में जाकर भुगत्तता है; फिर कर्मों के अनुसार और जन्मों को भुगत्तता है। और फिर मनुष्य शरीर धारता है। हे लीले ! यह पापात्मा की मृत्यु कही अब धर्मात्मा की मृत्यु सुन। जो महा धर्मात्मा है वह जब मृतक होता है तब उसके निमित्त विमान आते हैं उन पर आरूढ़ कराके उसे स्वर्ग में ले जाते हैं। जिस इष्टदेवता की वासना उसके हृदय में होती है उसके लोक में उसे ले जाते हैं और उसके कर्मानुसार स्वर्ग सुख भुगत्तता है स्वर्ग सुख जो गन्धर्व, विद्याधर, अप्सरा आदिक भोग हैं उनको भोग के फिर गिरता है और किसी फल में स्थित होता है। तब उस फल को मनुष्य भोजन करता है तब वीर्य में जा स्थित होता है और उस वीर्य से माता के गर्भ में स्थित होता है। वहाँ से वासना के अनुसार फिर जन्म लेता है; जो भोग की कामना होती है तो श्रीमान् धर्मात्मा के