भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

उत्पत्ति प्रकरण । २४६

कहाँ थी, लीला का शरीर कहाँ था और उसकी सत्ता कहाँ थी ? वह तो अरुन्धती के मन में लीला के शरीर की भ्रान्ति प्रतिभा हुई थी । जैसे मरुस्थल में जल की प्रतिभा होती है वैसे ही लीला के शरीर की प्रतिभा उसे हुई थी । हे रामजी ! यह आधिभौतिक अज्ञान से भासता है और बोध से निवृत्त हो जाता है । जब उस लीला को बोध में परिणाम हुआ तब उसका आधिभौतिक शरीर निवृत्त हो गया-जैसे सूर्य के तेज से बरफ का पुतला गल जाता है-और आन्तवाहिकता उदय हुई। हे रामजी ! जो कुछ जगत् है वह सब आकाशरूप है । जैसे रस्सी में सर्प भ्रम से भासता है तैसे ही आन्तवाहिकता में आधिभौतिकता भ्रम से भासती है । आदि शरीर आन्तवाहक है अर्थात् सङ्कल्पमात्र है उसमें दृढ भावना हो गई उससे पृथ्वी आदि तत्त्वों का शरीर भासने लगा । वास्तव में न कोई भूत आदिक तत्त्व है और न कोई तत्त्वों का शरीर है । उसका शव शश-के शृंगों की नाईं असत् है । हे रामजी ! आत्मा में अज्ञान से आधिभौतिक भासे हैं । जब आत्मा का बोध होता है तब आधिभौतिक नष्ट हो जाते हैं । जैसे किसी पुरुष ने स्वप्न में आपको हरिण देखा और जब जाग उठा तब हरिण का शरीर दृष्टि नहीं आया तैसे ही अज्ञान से आधिभौतिकता दृष्टि आई है और आत्मबोध हुए आधिभौतिकता दृष्टि नहीं आती । जब सत्य का ज्ञान उदय होता तब असत् का ज्ञान लीन हो जाता है । जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प भासता है और रस्सी के ज्ञान से सर्प का ज्ञान लीन होता है तैसे ही सम्पूर्ण जगत् मन से उदय हुआ है और अज्ञान से आधिभौतिकता को प्राप्त हुआ है । जैसे स्वप्न में जगत् आधिभौतिक हो भासता है और जागे में स्वप्न शरीर नहीं भासता तैसे ही आत्मज्ञान से आधिभौतिकता निवृत्त हो जाती है और आन्तवाहक शरीर भासता है । रामजी बोले, हे भगवन् ! योगीश्वर जो आन्तवाहक शरीर से ब्रह्मलोक पर्यन्त आते जाते हैं उनके शरीर कैसे भासते हैं ! वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आन्तवाहक शरीर ऐसे हैं जैसे कोई पुरुष स्वप्न में हो उसको पूर्व के जाग्रत् शरीर का स्मरण हो तब स्वप्न शरीर दृष्टि भी आता है पर उसको आकाशरूप जानता है; तैसे ही