योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण। २५७
शत्रुभावना होती है तब वही शत्रु हो भासता है । हे रामजी ! जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही स्वरूप हो भासता है । जिसका संवेदन तीव्र-भाव के अभ्यास से निर्मलभाव को प्राप्त होता है उसका संकल्पसत् होता है और जैसे चेतता है तैसे ही सिद्ध होता है । इससे संवेदन की तीव्रता हुई है । हे रामजी ! रोगी को एक रात्रि कल्प के समान व्यतीत होती है और जो आरोग्य होता है उसको रात्रि एक क्षण की नाईं व्यतीत होती है । एक मुहूर्त्त के स्वप्न में अनेक वर्षों का अनुभव करता है और जानता है कि मैं उपजा हूँ; ये मेरे माता-पिता हैं; अब मैं बड़ा हुआ और ये मेरे बान्धव हैं । हे रामजी ! एक मुहूर्त्त में इतने भ्रम देखता है और जागे पर एक मुहूर्त्त भी नहीं बीतता । हरिश्चन्द्र को एक रात्रि में बारह वर्षों का अनुभव हुआ था और राजा लवण को एक क्षण में सौ वर्षों का अनुभव हुआ था । इससे जैसा जैसा रूप होकर संवेदन फुरता है तैसा ही तैसा होकर भासता है । हे रामजी ! ब्रह्मा के एक मुहूर्त्त में मनुष्य की आयु व्यतीत हो जाती है । ब्रह्मा जितने काल में एक मुहूर्त्त का अनुभव करता है मनुष्य उतने ही में पूर्ण आयु का अनुभव करता है और ब्रह्मा जितने काल में अपनी संपूर्ण आयु का अनुभव करता है सो विष्णु का एक दिन होता है । ब्रह्मा की आयु व्यतीत हो जाती है और विष्णु को एक दिन का अनुभव होता है । इससे जैसे जैसे संवेदन में दृढ़ता होती है तैसा तैसा भाव होता है । हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुम देखते हो सो संवेदन फुरने में स्थित है । जब संवेदन स्थित होता है तब न दिन भासता है; न रात्रि भासता है; न कोई पदार्थ भासते हैं और न अपना शरीर भासता है केवल आत्मतत्त्वमात्र सत्ता रहती है । इससे तुम देखो कि सब जगत् मन के फुरने में होता है । जैसा जैसा मन फुरता है तैसा तैसा रूप हो भासता है । कड़वे में जिसको मीठे की भावना होती है तो कडु वा उसको मीठा हो जाता है और मीठे में जिसको कटुक भावना होती है तब मधुर भी उसको कटुकरूप हो जाता है । स्वप्न और शून्य स्थान में नाना प्रकार के व्यवहार होते भासते हैं और स्थित पड़ा स्वप्न में दौड़ता फिरता है । इससे जैसी फुरना मन में होती है