भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 256, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 256

उत्पत्ति प्रकरण । २५६

हे रामजी ! जो कुछ जगत् भासता है सो कुछ आदि से उपजा नहीं- सब आकाशरूप है । रोकनेवाली कोई भीति नहीं है, बड़े विस्तार से जगत् है परन्तु स्वप्नवत् है । जैसे थम्भे में बनाये बिना पुतली शिल्पी के मन में भासती है और थम्भे में कुछ बनी नहीं तैसे ही आत्मरूपी थम्भा है उसमें जगतरूपी पुतलियों को संवेदन रचता है परन्तु वह कुछ पदार्थ नहीं है आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों है । हे रामजी ! जैसे एक स्थान में दो पुरुष लेटे हों और उनमें एक जागता हो और दूसरा स्वप्न में हो तो जो स्वप्न में है उसको बड़े युद्ध होते भासते हैं और जागे हुए को आकाशरूप है तैसे ही जो प्रबोध आत्मज्ञानवान् है उसको जगत् का सुषुप्ति की नाईं अभाव है और जो अज्ञानी है उसको नाना प्रकार के व्यवहारों सहित स्पष्ट भासता है । जैसे वसन्तऋतु में पत्र, फल और गुच्छे रससहित भासते हैं तैसे ही आत्मसत्ता चैतन्यता से जगतरूप भासती है । जैसे स्वर्ण में द्रवता सदा रहती है परन्तु जब अग्नि का संयोग होता है तभी भासती है । हे रामजी ! आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । जैसे अवयवी और अवयवों में और पृथ्वी और गन्ध में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । ब्रह्मसत्ता ही संवेदन से जगतरूप होकर भासती है और दूसरी कोई वस्तु नहीं । जब महा- प्रलय होता है और सर्ग नहीं होता तब कार्यकारण की कल्पना कोई नहीं होती, केवल चिन्मात्र सत्ता होती है और उसमें फिर चिदाकाश जगत् भासता है तो वही रूप हुआ । जो तुम कहो कि इस जगत् का कारण स्मृति है तो सुनो जब महाप्रलय होता है तब ब्रह्माजी तो विदेह मुक्त होते हैं फिर वह जगत् के कारण कैसे हों और जो तुम स्मृति का कारण मानो तो स्मृति भी अनुभव में होती है जो स्मृति से जगत् हुआ तो भी अनुभवरूप हुआ । रामजी ने पूछा; हे भगवन् ! पद्म राजा के मन्त्री नौकर और सब लोग विदूरथ को कैसे जाकर मिले ? यह वार्ता फिर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! केवल चेतनसंवित् सबका अपना आप है उस संवित् के आश्रय में जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही रूप हो भासता है । हे रामजी ! जब राजा विदूरथ मृतक होने लगा तब उसकी

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