योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २६१
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अहं, त्वं आदिक दृश्यभ्रान्ति कारण बिना परमात्मा से कैसे उदय हुई है ? जिस प्रकार में समझूँ उसी प्रकार मुझको समझाइये । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो कुछ कारण-कार्य जगत् भासता है वह परमात्मा से उदय हुआ है अर्थात् संवेदन के फुरने से इकट्ठे ही पदार्थ भास आये हैं और सर्वदा, सर्वप्रकार, सर्वात्मा, अजरूप अपने आप में स्थित हैं। हे रामजी ! यह सर्व शब्द और अर्थ-रूप कल्पना जो भासी है, सो ब्रह्मरूप है; ब्रह्म से कुछ भिन्न नहीं और ब्रह्मसत्ता सर्व शब्द अर्थ की कल्पना से रहित अपने आप में स्थित है। जैसे भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं और तरङ्ग जल से भिन्न नहीं तैसे ही ब्रह्म से भिन्न जगत् नहीं-ब्रह्मस्वरूप ही है। हे रामजी ! ईश्वर जो आत्मा है सो जगतरूप है, जगत् ईश्वररूप है। जैसे सुवर्ण भूषणरूप है और भूषण सुवर्णरूप है अर्थात् सुवर्ण में भूषण शब्द और अर्थ कल्पित हैं-वास्तव में नहीं-तैसे ही जगत् आत्मा का आभासरूप है-वास्तव में कुछ नहीं। हे रामजी ! जो कुछ जगत् है सो ब्रह्मरूप है ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। जैसे अवयव अवयवी से भिन्न नहीं तैसे ही आत्मा से जो कुछ अवयवी जगत् है सो भिन्न नहीं। आत्मा में संवेदन के फुरने से तन्मात्रा फुरी है और आत्मा में ही इनका उपजना सब हुआ है; पीछे विभाग-कल्पना हुई है इसलिये उनसे जो भूत हुए हैं वे आत्मा से अन्य नहीं। जैसे शिला में चितेरा भिन्न-भिन्न पुतली कल्पता है सो शिलारूप ही हैं; भिन्न कुछ नहीं; तैसे ही अहं त्वं आदिक जगत् चिद्घन आत्मा में मन-रूपी चितेरे ने कल्पा है सो चिद्घनरूप ही है; कुछ भिन्न नहीं जैसे जल में तरङ्ग स्थित होते हैं सो जलरूप ही हैं; तरङ्गों का शब्द और अर्थ जल में कोई नहीं, तैसे ही आत्मा जगत् स्थित है, पर जगत् के शब्द और अर्थ से रहित है। हे रामजी ! जगत् परमपद से भिन्न नहीं और परमपद जगत् बिना नहीं; केवल चिद्रूप अपने आपमें स्थित है। जैसे वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं है स्पन्द और निस्पन्द दोनों रूप वायु के ही हैं। जब स्पन्दरूप होता है तब स्पर्शरूप होकर भासता है और निस्पन्द हुए स्पर्श नहीं भासता; तैसे ही जगत् और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं; जब